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खुद को संवारो

हजारों श्रोताओं के बीच संत उपदेश दे रहे थे. ‘मनुष्यता बहुत ऊंची चीज है. हमें अपने लिए अपने परिवार, अपने राष्ट्र और अपने समाज के लिए उसके आदर्शों का पालन करना चाहिए. कैंसे आदर्श, यही कि हम बुराइयों से बचें, आपस में लड़ेंझगड़ें नहीं, मिलजुलकर रहें मिलबांट कर खाएं और दूसरों के साथ वही व्यवहार करें, जैसा उनसे अपने प्रति चाहते हैं. ’

कुत्ते को उपदेश बहुत पसंद आया. बिना किसी देवता या धर्म का नाम लिए कितनी अच्छी बातें बताई जा रही हैं. इन उपदेशों की जरूरत तो हम कुत्तों को भी है. उसने सोचा, हम भी आपस में लड़तेझगड़ते हैं. यदि कोई कुत्ता भूले से भी दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश कर जाए तो वहां के कुत्ते उसपर टूट पड़ते हैं. जबकि इंसान को देखो. वह अपने अतिथि को भी देवता मानकर पूजता है.

उस दिन कुत्ता परिवार के बीच पहुंचा तो सारी बातें बताते हुए कहा—‘ऐसे पवित्र उपदेशों की जरूरत तो हम कुत्तों को भी है. मैं उन्हें उपदेश दूंगा.’

आदमी की होड़ करने से कोई लाभ नहीं है. हर आदमी दुहरा जीवन जीने का अभ्यस्त होता है. जबकि जानवरों की कथनी और करनी एक होती है. कहीं ऐसा न हो कि लेने के देने पड़ जाएं.’ लेकिन कुत्ता नहीं माना. उसने जानवरों को एकत्र करना शुरू कर दिया. जोरदार सभा हुई. कुत्ते ने भाषण में जो सुना था, वही थोड़े फेरबदल के साथ वह प्रवचन देने लगा. जानवरों में उसके प्रवचन की खूब सराहना हुई. कुत्ते को जंगल के दूसरे हिस्से से भी प्रवचन के बुलावे आने लगे. वह खुशीखुशी वहां उपदेश देने लगा. एक दिन वह उपदेश दे रहा था कि एक कुत्ता सभा के बीच खड़ा होकर बोला—

महोदय आप कहते हैं कि हर कुत्ते को अपना भोजन स्वयं अर्जित करना चाहिए. आप सुबह से शाम तक प्रवचन देते हैं, उसके लिए इस जंगल से उस जंगल तक जाना पड़ता है. इन हालात में आप आप अपना भोजन कब जुटाते हैं?’

कुत्ता चुप. इस प्रश्न के लिए वह तैयार ही नहीं था. इसपर बाकी कुत्तों की हिम्मत भी सवाई हो गई. एक और कुत्ता उठकर बोला—‘मान्यवर, क्या आप जानते हैं कि आपकी देखादेखी जंगल में उपदेश बघारने वालों की पूरी फौज खड़ी हो चुकी है. उनमें से हरेक के साथ दर्जनों चेलेचपाटे हैं. जो खुद कुछ नहीं करते. अपने भोजन के लिए बाकी कुत्तों पर निर्भर रहते हैं. अगर ऐसा हुआ तो धर्म और परंपरा के नाम पर निकम्मों की फौज खड़ी हो जाएगी.’

उसके बैठते ही तीसरा कुत्ता खड़ा हो गया. बोला-‘मैंने गिनती की है, इस जंगल में खुद को संत कहने वाले कुत्तों की संख्या अठारह तक पहुंच चुकी है. यही नहीं उनकी देखादेखी बंदर, भालू, ने भी अपनेअपने प्रवाचक पैदा कर लिए हैं. उनके साथ हजारों परजीवी जानवरों की फौज पैदा हो चुकी है. उनके कार्यकर्ता बाकी जानवरों पर जोर डालकर उनसे भोजन की व्यवस्था करने को कहते हैं. इससे तो जंगल के बंटने और पूरी व्यवस्था के नष्ट हो जाने का खतरा पैदा हो चुका है.’

कुत्ता इस बारे में पहले भी सुन चुका था. समस्या की गंभीरता का उसको अंदाजा था. उसने ऐलान किया—‘मैंने प्रवचन की शुरुआत यह सोचकर की थी कि इससे हम आपस में मिलजुलकर रहना, एक दूसरेकी मदद करना सीखेंगे. मगर इस काम में स्वार्थी लोगों के आ जाने से हालात और भी बिगड़ते जा रहे हैं. इसलिए आगे से मैं यह प्रवचन बंद करता हूं. अब हमारा नारा होना चाहिए खुद को संवारो, यह संदेश हम आपस में बातचीत के माध्यम से जानवरों तक पहुंचाएंगे.

उस दिन के बाद से जंगल से प्रवचन की परंपरा समाप्त कर दी गई. आदमी इससे कब सबक लेगा, यही देखना है.

ओमप्रकाश कश्यप

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4 comments on “खुद को संवारो

  1. bahut hi achhi prernadayak rachna…..

  2. आदमी सबक लेना ही नहीं चाहता, ऐसा लगने लगा है.

  3. बहुत अच्छी रचना! लेकिन कोई इन्सान सबक नही लेना चाहता है तो क्या करें

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