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मालिक

भोजन की तलाश में दर-दर भटकने से ऊब चुका पिल्ला मां

से बोल—‘मां, रोटी के लिए यहां-वहां ठोकर खाने में बड़ा

अपमान महसूस होता है. जिसकी मर्जी हो एकाध टुकड़ा

डाल देता है, अधिकांश तो दुत्कार ही देते हैं. क्यों न हम

अपने लिए एक मालिक की तलाश कर लें.’

‘बेटा, आसान दिखने वाली रोटी अक्सर बड़ी कीमत वसूलती

है. जो मालिक हमें अपने घर रखेगा, समय पर भोजन देगा,

नहलाएगा-धुलाएगा—वह हमारे गले में पट्टा डालकर

रखेगा, अपनी मर्जी के अनुसार नचाएगा. तेरे पिता कहा

करते हैं कि मालिक लोग काम देह से लेते हैं, मगर गुलामी

दिमाग की चाहते हैं.’

‘तू कुछ भी कह मां, मुझसे तो रात-दिन की लताड़ सही नहीं

जाती.’ इसी के साथ पिल्ला अपने लिए मालिक की खोज में

जुट गया. संयोग से एक लड़के का दिल उस पिल्ले पर आ

गया. वह उसको अपने घर ले गया. घर पहुंचते ही लड़का

उसके लिए दूध ले आया. पिल्ला खुशी-खुशी दूध पीने लगा.

इसी बीच लड़के ने उसके गले में लोहे की जंजीर पहना दी.

पिल्ले के लिए यह नया एहसास था. मगर दूध की मिठास

और नए घर के उल्लास में उसने अपनी गुलामी के प्रतीक

को नजरंदाज कर दिया.

पिल्ला वहां मजे से रहने लगा. कुछ ही दिनों में पूरा परिवार

उससे हिल-मिल गया. अब उसे सुबह-शाम वक्त पर खाने को

मिलता. वह जान गया कि मालिक को उसका पूंछ हिलाना

पसंद है, तो वह उसको खुश करने के लिए पूंछ हिलाने लगा.

मालिक चाहता था कि पिल्ला घर आए मेहमानों के पैरों को

चूमा करे. उसकी खुशी के लिए उसने कुछ ही दिनों में सारे

मेहमानों की पहचान कर ली. जब भी उनमें से कोई घर

आता, वह उनके पैरों में लौटता, कूं-कूं करते हुए उनके

आगे-पीछे दौड़ता, चक्कर लगाता. इससे मालिक या उसके

मेहमानों की ओर से उसको एकाध टा॓फी या बिस्कुट ज्यादा

मिल जाया करता था.

‘कुत्ते की पहचान भौंकने से होती है, ठीक है कि मैं मालिक के

आगे-पीछे डोलता हूं, उसको रिझाने के लिए पूंछ हिलाता हूं,

प्यार का नाटक करता हूं. तो मेरा जाता ही क्या है. यह सब

करके मैं दर-दर भटकने तथा मौसम की मार से तो बचा हुआ

हूं. आखिर मालिक भी तो अपने मतलब के लिए दूसरों के

आगे-पीछे डोलता, उनके आगे गिड़गिड़ाता है.’ गुलामी के

दर्द को भुलाने के लिए पिल्ला मन को समझाता. उसे इस

बात की प्रसन्नता थी कि उसकी भौंकने की आजादी अब भी

बाकी है. मालिक और घर आने वाले मेहमानों को छोड़कर

वह किसी के भी ऊपर जितना जी चाहे भौंक सकता है.

उसको भौंकते देख, मालिक को खुशी ही मिलती है.

कभी-कभी वह सोचता—

‘अच्छा होगा कि मां और बापू भी अपने लिए एक-एक

मालिक खोज लें, बुढ़ापे में इधर-उधर भटकने से तो बच

जाएंगे.’

एक दिन बाजार से गुजरते समय उसे अपने बचपन का

दोस्त लालू दिखाई पड़ा. कुछ ही महीने पहले तक वे दोनों

साथ-साथ खेला करते थे. उसने सोचा कि पल-भर के लिए

उससे मिल ले, मगर जैसे ही वह उसकी ओर बढ़ा, मालिक ने

जंजीर को जोर से झटका दिया. वह हवा में लटक गया. गले

में फांसी का फंदा कसने जैसा एहसास हुआ. उसकी हालत

देख लालू ने भौंककर मालिक पर अपना रोष प्रकट किया.

इसपर जूते की करारी ठोकर उसके पेट पर पड़ी. वह दर्द से

बिलबिला उठा.

‘मेरी वजह से बेचारे लालू को मार खानी पड़ी…क्या सोच

रहा होगा वह. मां गलत नहीं कहती थी, मालिक चाहता है

कि मैं अपने अतीत को भी भुला दूं. अपना दिमाग यहां तक

कि अपनी भावनाएं भी उसके आगे गिरवी रख दूं. भले ही वे

मुझे एक कुत्ते से ज्यादा अहमियत न दें.’ पिल्ले को अपने

अपमान का गम नहीं था, मगर वह लालू को पड़ी मार से

आहत था. पहली बार उसको मालिक पर गुस्सा आया. उस

दिन वह उससे प्यार जताने का नाटक भी नहीं कर सका.

अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह मालिक पर

भौंकना चाहता था. मगर गले से आवाज न निकल सकी.

अगले दिन उसकी तबियत खराब थी. उसी दिन मालिक का

चचेरा भाई घर पहुंच गया. वह हद दर्जे का मोटा और

थुलथुला था. वह पिल्ले के साथ खेलने का प्रयास करता,

मगर लद्धड़ इतना कि अपने ही बोझ के कारण अक्सर

फिसल जाता. उस दिन पिल्ले का जरा भी मन नहीं था कि

उसके साथ खेले. उसने विरोध भी किया. तब मोटे ने उसके

दो तमाचे जड़ दिए. इससे वह तिलमिला गया. किंतु यह

सोचकर कि मेहमान पर भौंकने से मालिक बुरा मान सकता

है, वह अपमान का घूंट पी गया.

घर में उसकी देखभाल की जिम्मेदारी नौकर पर थी. बाकी

सारे काम निपटा देने के बाद वही उसको नहलाता और

खिलाता-पिलाता. मालिक सिर्फ इतना ध्यान रखता कि

उसको खाने-पीने की कोई कमी न होने पाए. एक बार नौकर

बीमार पड़ा. मालिक ने आराम करने के लिए उसे उसके गांव

भेज दिया. उसके जाते ही पिल्ले को उस घर में अपनी

हैसियत का अनुमान होने लगा. नौकर न होने के कारण घर

के सदस्य आपस में लड़ते और खीझते रहते. किसी भी

ध्यान भूखे पिल्ले की ओर न जाता. एक दिन उसके गले में

रस्सी डालकर घर के सभी सदस्य पिकनिक मनाने निकल

गए. तब तक पिल्ले को बिना कुछ खाए तीन दिन बीत चुके

थे. उसकी यह स्थिति न थी कि हिल-डुल भी सके.

दोपहरी में चारों और सन्नाटा था. सहसा पिल्ले को अपने

सामने एक पैकेट दिखाई पड़ा. उससे मनभावन गंध आ रही

थी. लगता है, नौकर आ चुका है. अच्छा है, अब मुझे भूखा न

मरना पड़ेगा—सोचते हुए पिल्ले ने पैकेट खोला. उसमें ताजा

भुना मांस था. तीन दिन की भूख से उसका विवेक पहले ही

खत्म हो चुका था. वह मांस पर टूट पड़ा. खाते-खाते उसका

सिर घूमने लगा. उसकी चेतना उस समय लौटी जब मालिक

का डंडा उसकी पीठ पर पड़ा. उसको अपने प्राण निकलते हुए

महसूस हुए.

‘हरामखोर, घर में चोरी हो गई और तू सोता रहा.’ पीठ पर

डंडे बरसाता हुआ मालिक भुनभुना रहा था. वह जान से मर

न जाए यह सोचकर किसी ने पिल्ले की रस्सी खोल दी.

मौका मिलते ही जान बचाने के लिए वह भाग छूटा. कुछ

घंटों के बाद वह अपनी मां के पास था, वह उसको अपने पास

लिटाकर उसके घावों को चाट रही थी—‘मां, तीन दिन का

भूखा होने के कारण मुझे होश ही नहीं रहा था कि मैं जिस

मांस को खाने जा रहा हूं उसमें नशे की चीज मिली है. चोर

पूरी तैयारी के आए थे, सच कहता हूं मां, यदि मैं उन्हें

पहचान लेता तो जान पर खेलकर भी मालिक के घर की रक्षा

करता.’

‘जानती हूं बेटा, मालिक के लिए जान की बाजी लगा देना ही

हम कुत्तों की परंपरा रही है. मगर आज नहीं तो कल, मालिक

को तो ऎसा करना ही था.’

‘ऎसा किसलिए मां?’

‘इसलिए कि मालिक होता ही ऐसा है, वह कुछ देर के लिए

शरीर की काहिली बर्दाश्त कर सकता है, मगर दिमाग में

जरा-सी भी चेतना वह सहन नहीं कर पाता.’

‘मां भूखों मर जाऊंगा पर आगे कभी गुलामी नहीं करूंगा.’

पिल्ले ने उसी क्षण प्रण किया. अपनी पीड़ा को भुलाने का

प्रयास करता हुआ मां से सिमट गया.

ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “मालिक

  1. बहुत बढिया कहानी है। परन्तु कुत्तों से प्यार करने वाले स्वयं भूखे रह जाएँगे परन्तु कुत्ते को भूखा नहीं रखेंगे। हाँ, गुलामी तो खैर गुलामी है ही।
    घुघूती बासूती

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