1 टिप्पणी

बड़ा ठग

कुत्ता जंगल से गुजर रहा था. रास्ते में उसे एक आदमी सिर पर

मुंडासासा बांधे हुए दिखाई पड़ा. उसका चेहरा जानापहचाना था.

मगर कुत्ते को कुछ याद न आया. कुछ और आगे बढ़ा तो तीन

आदमियों को एक वृक्ष के नीचे बातचीत करते हुए देखा. उन्हें

पहचानने के प्रयास में कुत्ते की चाल मंथरा गई.

आज जब मैं पूजा कर रहा था तो बड़ा ही शुभ शगुन हुआ…’

कुत्ते ने उनमें से एक आदमी को कहते हुए सुना.

कैसा शगुन?’

पूजा करते समय मुझे लगा कि देवी मेरी ओर देखकर मुस्करा

रही है. चलने लगा तो उसके हाथों से एक फूल आकर मेरी थाली

में गिरा. मुझे लगता है आज हमारी खूब कमाई होगी.’

मैं तो हमेशा की तरह आज की कमाई का बीसवां हिस्सा देवी के

मंदिर के नाम कर दूंगा.’ तीसरा व्यक्ति बोला. कुत्ता समझ गया.

वे तीनों ठग हैं, और उनसे पहले मिला बूढ़ा उनका सरदार था.

कुत्ते को वहां जमे देख एक ठग जब उसको भगाने लगा तो कुत्ते

ने कहा‘अपने स्वार्थ के लिए लोगों को ठगते हुए तुम्हें शर्म

नहीं आती?’

कैसी शर्म, हम तो वही करते हैं तो देवी मां हमसे कराती हैं.’

अपने धत्कर्म के लिए देवी का नाम लेना तो और भी शर्म की

बात है?’

चल हट, तू क्या जाने कि सब कुछ पहले से सुनिश्चित होता है.

हमें वही मिलता है जो हमारे भाग्य में लिखा है. और जब जो

मिलना है, वह भाग्य में लिखा है तो जैसे मिलेगा वह भी तो

पहले से तय है. इसमें हमारा क्या है. ऐसे में हम क्यों पापपुण्य

से डरें.’ एक ठग ने कहा. कुत्ता समझ गया. ज्यादा कहने का भी

उनपर असर पड़ने वाला नहीं है. वह आगे बढ़ गया.

कुछ दूर चलने के बाद बाद बस्ती आरंभ हुई. गांव के बाहर ही

मंदिर बना था. आरती पूरी हो चुकी थी. भक्तगण वापस जाने की

तैयारी कर रहे थे. तभी पुजारी का चेहरा एक आदमी को मंदिर

की ओर आते देख चमक उठा—

आइए सेठ जी, आज जब मैं आरती कर रहा था तो तो बड़ा ही

शुभ शगुन हुआ था…’ पुजारी बोला. कुत्ते के लिए वे शब्द

जानेपहचाने थे.

कैसा शगुन पंडितजी?’

मुझे लगा कि भगवान मेरी ओर देखकर मुस्करा रहे हैं. जैसे ही

आरती संपन्न हुई मेरी थाली में एक फूल आकर गिरा. मैं समझ

गया कि स्वयं भगवान मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं. आज मेरी

किस्मत खुलने वाली है. आपको आते हुए देखा तो हैरान रह

गया. भगवान ने आशीर्वाद दिया है तो फलना तो निश्चित था ही.

मगर इतनी जल्दी फलेगा, यह मैंने बिलकुल नहीं सोचा था.’

पुजारी के मुंह से प्रशंसा सुनकर आगंतुक का चेहरा खिल उठा.

उसने जेब में हाथ डाला और जितने भी रुपये हाथ में आए सब

पुजारी की थाली में डाल दिए. उसके बाद उसने पूजा की और घर

लौट गया.

सेठ के जाते ही कुत्ता पुजारी के पास आकर बोला—‘आज तो

अच्छा मूर्ख बनाया सेठ को. बेचारा सोच ही नहीं पाया और जेब

खाली करके चला गया. मगर एक बात बताइये, धर्म और

पूजापाठ के नाम पर लोगों को इस तरह उल्लू बनाते हुए तुम्हें

शर्म नहीं आती?’

चल हट, तू क्या जाने कि सब कुछ पहले से सुनिश्चित होता है.

हमें वही मिलता है जो हमारे भाग्य में लिखा है. और जब जो

मिलना है, वह भाग्य में लिखा है तो जैसे मिलेगा वह भी तो

पहले से तय है. इसमें हमारा क्या है. हम क्यों पापपुण्य से डरें.’

पुजारी के मुंह से ठग के शब्दों को सुनकर कुत्ता चौंक पड़ा.

क्या आप भी आज की कमाई का बीसवां हिस्सा मंदिर के नाम

करेंगे?’

किसलिए! मुझसे अलग भला मंदिर क्या है.’ पुजारी ने तपाक से

पूछा और कुत्ते को भगाने के लिए डंडा उठा लिया.

बड़ा ठग हैशुक्र है, इसने यह नहीं कहा कि मुझे अलग ईश्वर

क्या है!’ कुत्ते के मुंह से अनायास निकल पड़ा.

ओमप्रकाश कश्यप

Advertisement

One comment on “बड़ा ठग

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: