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दर्शन

दोपहरी में धूप आसमान पिघलाने की जी-तोड़ कोशिश में लगी थी. कुछ पल आराम की कोशिश में कुत्ता ठिकाने की तलाश में मंदिर की ओर निकला. वहां दरवाजे पर पुजारी को देखकर वह सहम गया.
‘आप अभी तक यहीं हैं?’ कुत्ते ने पीछे हटते हुए पूछा. पुजारी कुछ कहे, उससे पहले की उसकी दृष्टि रास्ते की ओर उठ गई. वहां एक श्रद्धालु अपने हाथों में लोटा थामे मंदिर की ओर बढ़ा चला आ रहा था. उसकी चाल लड़खड़ा रही थी. करीब आने पर कुत्ते ने जान लिया कि उसकी टांगें पोलियो की शिकार है.
‘इतनी तेज धूप में इसको मंदिर आने की जरूरत ही क्या थी?’ दीवार के साये में ठिकाना खोजता हुआ कुत्ता बड़बड़ाया. पुजारी ने सुन लिया-
‘मुक्ति की साध गर्मी-सर्दी नहीं देखती. लेकिन मुक्ति के आनंद के बारे में तुम अधम जानवर भला क्या जानो.’ पुजारी ने प्रतिवाद किया.
‘महाराज आप तो वर्षों से इस मंदिर में हैं. रोज यहां सैकड़ों श्रद्धालु कोई न कोई कामना लेकर पहुंचते हैं. क्या आप बता सकते हैं कि उनमें से कितनों की मनोकामना पूरी हुई है?’
‘मैं अपना ध्यान प्रभुभक्ति में लगाता हूं. हिसाब-किताब में वक्त नहीं गंवाता.’ पुजारी ने पीछा छुड़ाना चाहा.
‘तो एक दिन भगवान से ही पूछकर बता दीजिए?’
‘वे भक्तों का कल्याण करने में लगे रहते हैं…कितनों का कल्याण किया है, भगवान को उनकी गिनती करने की सुध कहां.’
तब तक वह श्रद्धालु लंगड़ाता हुआ मंदिर पहुंच चुका था. पुजारी को द्वार पर इंतजार करते देख उसने अपनी गति बढ़ा दी थी, जिसके कारण वह हांफ रहा था.
‘सुबह मंदिर में बड़ी भीड़ होती है…’ श्रद्धालु के चेहरे पर याचना का भाव था. पुजारी की एक नजर उसके हाथ, दूसरी उसकी जेब पर टिकी थी. मंदिर में जल चढ़ाने के बाद जब वह जाने लगा तो पुजारी ने टोक दिया-
‘भगवान तो सब जगह हैं, केवल जल चढ़ाने के लिए इतनी दूर आने की क्या जरूरत थी.’ श्रद्धालु उसका आशय समझकर बोला—
‘तीन दिन से मजदूरी नहीं मिली….टांग खराब होने के कारण सभी बचना चाहते हैं.’
‘इनका कहने का आशय है कि जिस दिन जेब भारी हो उस दिन भी मंदिर आने की जरूरत नहीं है. पूजा वगैरह जो करनी हो, घर ही कर लिया करो. भगवान तो हर जगह हैं, क्यों पुजारी जी….’ कुत्ते ने कटाक्ष किया.
‘ठहर, अभी बताता हूं.’ चिढ़ा हुआ पुजारी कुत्ते को मारने के लिए दौड़ा. कुत्ता वहां से भाग छूटा, फिर सुरक्षित दूरी पर जाकर बोला—
‘महाराज, पहले जमाने में ठग भी अपाहिज, बूढ़े, कोढ़ी, नर्तक और दलित को छोड़ दिया करते थे. क्या मंदिर में इन्हें बिना चढ़ावे के आने की अनुमति नहीं दी जा सकती…’ इसपर पुजारी ने क्रुद्ध दृष्टि से देखा, ‘ठीक है, जाने दीजिए आपके भगवान को अपने भक्तों की गिनती करने तक की तो फुर्सत है नहीं.’ तब तक पुजारी हाथ में पत्थर उठा चुका था. उधर कुत्ता भी सावधान था. एक ओर झुककर वह वार को बचा गया. इसपर पुजारी खीझ गया और झोला कंधे पर रखकर बड़बड़ाया-
‘‘इतनी देर तक फिजूल इंतजार किया…अब तक तो घर पहुंच चुका होता.’ पुजारी घर को चला तो कुत्ता भी आगे बढ़ गया. अब वह मंदिर के साये से भी बचना चाहता था.
ओमप्रकाश कश्यप

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2 comments on “दर्शन

  1. साधुवाद इस कथा के लिए.

  2. बहुत प्रेरक प्रसंग है आभार्

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