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पागलपन

कुत्ते को लगा कि वह बहुत भटक लिया. और अधिक सड़कछाप रहने से

लाभ नहीं. उचित होगा कि नया मालिक ढूंढ लिया जाए. इसी के साथ

वह नए मालिक की तलाश में जुट गया. भटकता हुआ वह एक वकील

के घर पहुंचा. कुत्ते की बात सुनने के पश्चात वह बोला—

तुम्हें भलेबुरे की पहचान तो होगी?’

मैं चोर की चाल सौ कदम दूर से ही पहचान लेता हूं.’ कुत्ते ने डींग

मारी.

उसके बाद क्या करते हो?’

आने वाला यदि भरोसेमंद है तो उसके कदमों में बिछ जाता हूं.

चोरडकैत तो मेरी आवाज से ही मैदान छोड़ देते हैं.’

हूं, मुझे तुम्हें आश्रय देने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन एक शर्त पर.

तुम्हें दिन के उजाले में घर आए हर मेहमान का स्वागत करना होगा?’

चोरडकैत और हत्यारों का भी?’

चोरडकैत तो वे दुनिया और कानून की नजर में होंगे. हमारे लिए तो वे

हमारे ग्राहक और अन्नदाता हैं.’ कुत्ता कुछ समझ न पाया तो पूछा, ‘फिर

मैं भौंकूंगा किसपर? बिना भौंके तो मेरा खाना तक नहीं पचता.’

इस घर में पुलिस वाले भी आते हैं और जज भी.’ उनके ऊपर तुम

जितना चाहे भौंक सकते हो.’ कुत्ता राजी हो गया. इससे पहले जिस

मालिक के घर भी गया, प्रत्येक ने पुलिस पर भौंकने को मना करते थे.

पहली बार कोई मिला जो पुलिस से भी ताकतवर दिखता है. यहां रहकर

वह अपना वर्षों का गुबार निकाल सकता है.

मैं तो मालिक के हुक्म का गुलाम हूं. आप जिसपर कहेंगे उसपर

भौंकूगा. जिसे आने को कहेंगे, उसका पूंछ हिलाकर स्वागत करूंगा. खुश

करने के लिए उसके कदमों में नाक रगड़ूंगा.’ कुत्ते ने कहा. वकील ने

उसको रहने के लिए जगह दे दी. अच्छा खाने को मिला, अच्छा रहने

को.

वर्षों भटकने के बाद जिंदगी का अब असली सुख मिला है, काश, मैं

कुछ दिल पहले ही यहां आ जाता.’ सुख के अतिरेक के बीच कुत्ते को यह

अफसोस थोड़ा उदास कर जाता. इस बीच उसने खुद को अपने मालिक

की मर्जी के अनुसार ढाल लिया था. कोठी में चोरडकैत, हत्यारे,

बलात्कार के मुजरिम वगैरह सब आते. हर ग्राहक का स्वागत वह देवता

समझकर ही करता. जिसमें उसको ग्राहक होने के लक्षण नहीं आते, या

ग्राहक होने के बावजूद जेब खाली दिखती, वह भौंकभौंककर उसका कोठी

में घुसना नामुमकिन कर देता था. वकील अत्यंत व्यस्त आदमी था. कुत्ते

का यह व्यवहार उसको बहुत ही भला लगता. धीरेधीरे दोनों परस्पर

करीब आते गए. कुत्ता भी अपने मालिक की इच्छा के अनुरूप खुद को

लगातार ढालता चला गया.

उन्हीं दिनों शहर में स्वामीभक्त कुत्तों की प्रतियोगिता आरंभ हुई. कुत्ता

अपने मालिक के पास पहुंचकर बोला—‘स्वामी जब से आया हूं तभी से

मैंने आपकी जीजान से सेवा की है. आपके लिए मैंने अपनी आदतों को

भी पूरी तरह बदल डाला है. यह पुरस्कार तो मुझे ही मिलना चाहिए.’

क्या बात कहते हो, तुम्हें यह पुरस्कार कभी नहीं मिल सकता.’ वकील

ने कहा. सुनकर कुत्ते को धक्का लगा, पूछा—

क्या मैं इस लायक नहीं?’

कुत्ते के प्रश्न का उत्तर दिए बिना ही वकील वहां से उठ गया. कुत्ते पर तो

पुरस्कार पाने की धुन सवार थी. प्रतियोगिता के दिन उसका मालिक

आ॓फिस के लिए निकला तो मौका देख वह भी घर से चल दिया.

प्रतियोगिता स्थल पर दर्जनों कुत्ते अपनेअपने मालिक के साथ उपस्थित

होकर, स्वामीभक्ति का बखान कर रहे थे. कोई घर को चोरों से बचाने का

किस्सा सुना रहा था तो कोई हत्यारे को पकड़वाने में अपनी सूझबूझ का

बखान कर रहा था. एक कुत्ते ने बताया कि उसने जंगल में खूंखार

भेड़िया का सामना कर, उसपर जीत प्राप्त की थी.

बारी आने पर वह कुत्ता भी आगे आकर बताने लगा—‘भाइयो, मैंने यहां

आए सभी प्रतिभागियों के कारनामों का बखान सुना. सचमुच आप सबकी

स्वामीभक्ति काबिले तारीफ है. फिर भी मेरी स्वामीभक्ति के आगे वह कुछ

नहीं हैं. साथियो, सेवक का धर्म है, मालिक के दिल की धड़कनों को

पहचाने, उसके आदेश की प्रतीक्षा किए बिना उसकी मर्जी को पहचान ले.

फिर उसके अनुसार काम करे. मेरा मालिक वकील है. उसके ग्राहकों में

अधिकांश चोरडकैत, हत्यारे, बलात्कारी या दूसरी किस्म के अपराधी

होते हैं. वह उनके लिए मुकदमे लड़ता है. सामदामदंडभेद की द्वारा

जहां तक बस चले उन्हें बचाता भी है. दुनिया की निगाह में वे चाहे जो

हों, मगर मालिक की निगाह में वे सब ग्राहक देवता हैं. पहले यह

सुनकर मुझे भी अजीबसा लगा था. उन दिनों मैं आम कुत्ते की तरह

अपराधियों और गुंडों पर भौंकता था. मगर अब वही करता हूं….जो

मालिक चाहता है…’

तभी कुत्ते की निगाह अपने मालिक पर पड़ी, जो उसके प्रतियोगितास्थल

पर जाने की खबर सुनते ही हड़बड़ाकर भागा चला आया था. उसको

देखकर कुत्ते का उत्साह और बढ़ गया…‘मैंने खुद को मालिक की

भावनाओं के अनुरूप पूरी तरह बदल लिया है….क्यों मालिक? आप इन्हें

बताइए कि इस पुरस्कार पर केवल मेरा अधिकार है.’

तभी वकील उठ खड़ा हुआ. उसने माथे पर आए पसीने को पोंछा और

बोला—‘भाइयो, इसकी बातों पर विश्वास मत कीजिए. यह सड़कछाप कुत्ता

है, पूरी तरह पागल हो चुका है. इसने न्याय के मंदिर की अवमानना की

है. सिपाहियो देखते क्या हो, इससे पहले की यह किसी को काटे, घायल

करे, इसे फौरन गोली मार दो.’

वकील ने जो कहा, उसपर कुत्ते को विश्वास न हुआ. वह दूसरे जानवरों

की प्रतिक्रिया जानना चाहता था कि तभी सभा स्थल पर पहरा दे रहे

सिपाहियों की बंदूकों को अपनी ओर तनते हुए देखा. उसके पसीने छूटने

लगे. फिर तो उसने आव देखा न ताव, वहां से फौरन भाग छूटा.

ओमप्रकाश कश्यप

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3 comments on “पागलपन

  1. बहुत सही लिखा है।
    सही कटाक्ष किया है।

  2. सही में कुत्ता पागल हो गया था …

    वीनस केसरी

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