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हंसी जिम्मेदारी का धर्म है

‘बापू ईश्वर ने सिर्फ आदमी को ही हंसना क्यों सिखाया?’

पिल्ले ने प्रश्न किया तो कुत्ते की बोलती बंद. ठीक-ठीक तो

क्या, आसपास का भी जवाब नहीं सूझा.

‘अगर मैं आदमी होता तो किसी पुस्तक में देखकर आसानी

से बता देता…आज पहली बार लग रहा है कि मृत्युलोक में

जानवर होना भी एक सजा है.’ कुत्ते ने अफसोस जाहिर

किया. उसके बाद तो दिमाग में जैसे फांस-सी पड़ गई.

सोचने लगा कि आखिर कोई तो कारण होगा जो ईश्वर ने

आदमी को ही हंसना सिखाया. लेकिन ईश्वर तो बताते हैं कि

समदृष्टा है. वह भला आदमी और जानवरों के बीच पक्षपात

क्यों करेगा. जरूर कोई बात है. कुत्ता ने बस्ती के वुजुर्गों से

पूछा. मगर उनमें से किसी को कुछ पता न था. सब

एक-दूसरे का मुंह देखने लगे थे. उसके बाद उसने हाथी, शेर,

भालू, चीता, गीदड़, सांप, छुछूंदर, चिड़िया, चील, हिरनिया,

बंदर, मछली सबसे पूछा. अंत में वह कछुए के पास पहुंचा.

उसने नदी के सबसे वुजुर्ग कछुए से मिलने की सलाह दी.

‘वे कहां मिलेंगे?’

‘आजकल उनसे ज्यादा चला-फिरा नहीं जाता. नदी के बाहर

भी सिर्फ पूनम की रात को ही आ पाते हैं. लेकिन यदि वे

जानते हों तो भी तुम्हें कोई लाभ नहीं होने वाला.’

‘क्यों?’ काफी भटकने के बाद कुत्ते को सफलता की जो आस

बंधी थी, मगर वह फिर टूटती हुई नजर आई.

‘उन्हें बहुत कम सुनाई पड़ता है, बात करते-करते भूल जाते

हैं. इसलिए इन दिनों उन्होंने दूसरों से मिलना-जुलना भी

बंद कर दिया है.

कुत्ते ने पूनम की रात का इंतजार किया. बताए गए ठिकाने

पर वह वुजुर्ग कछुए से मिलने पहुंचा. काफी अनुनय-विनय

के बाद उसने अपना मुंह खोला—

‘किसी जमाने में आदमी, देवता, जानवर सब साथ-साथ रहा

करते थे. उन दिनों हंसना सिर्फ देवताओं को आता था.

आदमी के पास दिमाग तो था, पर वह कब क्या सोच बैठे,

इसका भेद देवता भी नहीं समझ पाते थे. इसलिए उन्होंने

हंसने का गुण अपने तक सीमित रखा था. एक दिन आदमी

ने कुछ जानवरों को साथ लिया और देवताओं का घेराव

करने लगा. तब देवताओं ने कहा—

‘ठीक है, आज के बाद तुम सब हंसने लगोगे. लेकिन याद

रहे, हंसी जिम्मेदारी का धर्म है. इसका दुरुपयोग करोगे तो

इसे हमेशा के लिए खो बैठोगे.’

उसके बाद आदमी और जानवर सब हंसने लगे. एक बार एक

सभा हो रही थी. आदमी, देवता और जानवर सभी उसमें

सम्मिलित थे. बड़े-बड़े विद्वान वहां बुलाए गए थे. बहुत

गंभीर चर्चा हो रही थी. देवताओं को हंसने का सलीका आता

था. वे जरूरी अवसर पर सलीकेदार हंसी हंसते. पर आदमी

और जानवर तो इस मामले में बेशूर थे. वे मौके-बेमौके

किसी भी बात पर ठठा मारकर हंसने लगते. इससे सभा की

कार्रवाही में बिघ्न पड़ जाता. सभा के अध्यक्ष बार-बार याद

दिलाते कि हंसी जिम्मेदारी का धर्म है. लेकिन आदमी और

जानवर दोनों ही इससे अप्रभावित थे.

‘अगली बार यदि बिना बात कोई हंसा तो उसकी हंसने की

योग्यता समाप्त कर दी जाएगी.’ अध्यक्ष ने रोष जताया.

उसी समय कोई छींका. चेतावनी पर ध्यान दिए बिना सब

एक साथ हंस पड़े. इसपर अध्यक्ष को गुस्सा आ गया. उसकी

सिफारिश पर प्रधान देवता ने सभा में देवताओं को छोड़कर

जितने भी प्राणी मौजूद थे, सबकी हंसने की योग्यता वापस

ले ली. इसी के साथ सभा समाप्त होने की घोषणा भी कर दी

गई. जानवर मुंह लटकाए वापस आ गए. सभा से बाहर आते

ही आदमी जानवरों को संबोधित करते हुए बोला—

‘देवताओं ने हमारे साथ बड़ी नाइंसाफी की है. हमें किस

समय और किस बात पर हंसना चाहिए, यह हमारी मर्जी पर

निर्भर करता है. देवता इसमें टांग नहीं अड़ा सकते.’

‘पर देवता तो हमारी हंसने की योग्यता हमसे छीन चुके हैं?’

‘कोई बात नहीं. हंसना अगर देवताओं का अधिकार है, तो

हमारा भी है. हम अपना अधिकार लेकर रहेंगे. इसके लिए

कल हम देवताओं की सभा का घेराव करेंगे.’

घेराव के आहवान पर जानवर दो हिस्सों में बंट गए. अगले

दिन सभा की कार्रवाही आरंभ हुई तो आदमी जानवरों को

लेकर देवताओं के विरुद्ध घेराव और नारेबाजी करने लगा.

इसपर देवताओं को गुस्सा आ गया, और उसने आदमी और

उसके साथ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे जानवरों को

अमरपुरी से निकाल दिया. सिर्फ कुछ जानवर वहां रह गए.

वही आजकल देवताओं के साथ नजर आते हैं.’

‘लेकिन आदमी को तो आज भी हंसना आता है.’ कुत्ते ने

जानकारी बांटी.

‘आदमी के दिमाग को जब देवता नहीं समझ पाए तो

जानवर बेचारे कैसे समझ पाते. दरअसल आदमी पहले ही

दिन मौका देखकर सभा से बाहर खिसक आया था. उसके

बाद ही उसने जानवरों को देवताओं के विरुद्ध भड़काने के

लिए सोची-समझी चाल चली थी.’

‘वह किसलिए?’

‘आदमी देवताओं से आजादी चाहता था. वह जानता था कि

सिवाय देवताओं के हंसना उसी को आता है. स्वतंत्र राज्य

होगा तो वह जानवरों के सामने सबसे श्रेष्ठ, यहां तक कि

देवता होने का दावा कर सकेगा.’

‘तब तो आदमी बहुत काइयां है..’ कुत्ते के मुंह से निकला.

इसपर कछुआ गंभीर हो गया—

‘काइयां नहीं, अतिमहत्त्वाकांक्षी कहो. हालांकि वह भी बहुत

बुरी बात नहीं है. लेकिन अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के

लिए दूसरों के सुख-सम्मान से खेलना तो पाप हुआ न!

आदमी को कम से कम इतनी समझ तो आनी ही चाहिए.’

‘एक बात और भी आनी चाहिए कि हंसी जिम्मेदारी का धर्म

है.’ कुत्ते ने कहा और वहां से चल दिया, उसने जो सीखा, वह

जल्दी से जल्दी पिल्ले को भी समझाना था.

ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “हंसी जिम्मेदारी का धर्म है

  1. हँसना जिम्मेवारी सहित कहा ठीक यह धर्म।
    खुद पर हँसना हो अगर बहुत कठिन यह कर्म।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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