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नशा

इधर भक्तगण आरती गा रहे थे, उधर ईश्वर मंदिर में झपकियां ले रहा था. यह दृश्य कुत्ते को बड़ा अजीब लगा. वह ईश्वर के पास पहुंचकर जोर-जोर से भौंकने लगा. ईश्वर ने आंखें खोलीं. कुत्ता शिकायत दर्ज कराने लगा—
‘यह क्या प्रभु! उधर सैकड़ों भक्त आरती गा रहे हैं, पूजन-अर्चन में तरह-तरह के व्यंजन लुटा रहे हैं, इधर आप….यह तो भक्तों के साथ घोर अन्याय है, भगवन!’
ईश्वर ने अंगड़ाई लेकर आलस को दूर छिटका. फिर कुत्ते को संबोधित किया—
‘तुम कुछ भी कहो, पर रोज-रोज एक ही आरती, एकसमान पूजा-अर्चना, वही-वही भक्तिभाव, मैं तो इनसे ऊबने लगा हूं. ईश्वर के स्वर में उनकी पीड़ा और अपराधबोध दोनों सम्मिलित थे.
‘मनुष्य हर दिन नई आरती, पूजन-अर्चन की नई-नई सामग्री कहां से लाए?’
‘मैं भी कब चाहता हूं. मगर कर्मकांडों के लगातार दोहराव से तो उचित है कि लोग अपने काम पर ध्यान दें. उसमें संपूर्णता लाएं और मुझे भी शांतमन से अपना कार्य करने दें. जब जरूरी हो तो बिना लाग-लपेट, सच्ची-सरल भाषा में, सीधे संवाद करें.’
‘फिर इन पंडे-पुजारियों, मौलवियों, पादरियों और देवालयों का क्या होगा भगवन?’
‘लोककल्याण के इतने सारे काम हैं, सब कहीं न कहीं खप ही जाएंगें.’
कुत्ते को ईश्वर के साथ वार्तालाप में मजा आने लगा था. उसने तर्क दिया—‘जिस आदमी को आपकी आरती, पूजा का विधान न आए उसके लिए तो मंदिर आकर पंडे-पुजारी की मदद लेना जरूरी है न?’
‘वे लोग अपने घर पर भी तो संवाद करते हैं. जैसा व्यवहार वे अपने परिजनों के साथ करते हैं, वही मेरे साथ भी कर सकते हैं. बिचैलियों की जरूरत ही क्या है.’
कुत्ते को नया बोध जागा. उसको लगा कि बात ईश्वर के भक्तों तक पहुंचानी चाहिए. यही सोचता हुआ वह बस्ती की ओर बढ़ गया. गांव से बाहर एक मैदान में पहुंचा तो वहां कीर्तन चल रहा था. कुछ लोग गा रहे थे, कुछ पीछे-पीछे दोहरा रहे थे, कुछ केवल गर्दन हिला रहे थे, कुछ सिर्फ नींद के झौंके खा रहे थे. कुत्ते को वह भी कर्मकांड ही लगा.
‘मुझे इनको बताना चाहिए कि ईश्वर वास्तव में चाहता क्या है.’ कुत्ते ने सोचा और लोगों को आकर्षित करने के लिए जोर-जोर से भौंकने लगा. कीर्तन मंडली का ध्यान उसकी ओर गया तो वह बोला—
‘सज्जनो, ईश्वर ने मुझे बताया है कि उसकी कर्मकांड में कोई रुचि नहीं है. इसलिए सब अपने-अपने घर जाएं. जिसे समस्या है, वह उससे सीधे, अपनी भाषा में संवाद कर सकता है.’
‘क्या तुम ईश्वर से सीधे संवाद कर सकते हो?’ एक आदमी ने व्यंग्य किया.
‘पहले मुझे भी लगता था कि नहीं कर सकता. लेकिन मैं अभी-अभी ईश्वर से मिलकर आ रहा हूं. वे अपने भक्तों से जो अपेक्षा रखते हैं, वही मैंने आपसे कहा है.’
‘अरे देखो, वह कुत्ता होकर भी ईश्वर से बातचीत करने का दावा कर रहा है.’ एक ने कटाक्ष किया. सुनकर कई लोग हंस पड़े.
‘पगला गया है, मारो इसे,’ कीर्तन मंडली का मुखिया चिल्लाया. लोग मारने को दौड़े. कुत्ते को भागकर जान बचानी पड़ी.
‘बड़े अजीब लोग थे. जरा भी सुनने को तैयार नहीं थे. मुझे अपनी बात ऐसे लोगों को समझानी चाहिए जो ईश्वर के संदेश को शांतभाव से ग्रहण करने को तैयार हों.’ सुरक्षित स्थान पर उखड़ी हुई सांसों पर काबू पाने की कोशिश में कुत्ता बड़बड़ाया. वहां से वह दूसरे रास्ते पर बढ़ गया. कुछ दूर जाने के बाद ही उसे एक मस्जिद दिखाई दी. वहां सैकड़ों लोगों को एक साथ कतारबद्ध नमाज अता करते देख कुत्ते को प्रसन्नता हुई—
‘ये शांतिप्रिय लोग दिखते हैं. ये मेरी बात अवश्य समझ जाएंगे.’ कुत्ते ने सोचा और कहने लगा—
‘ईश्वर महान रचनाकार है. वह हर पल नया सोचता और नया गढ़ता है. दोहराव उसे अप्रिय है. इसलिए सब अपने-अपने घर जाएं. जिसे जो कहना है, वह अपने घर जाकर ईश्वर से अपने ही तरीके से, सीधे संवाद करे.’
‘क्या तुम नबी हो, जो सबकुछ जानते हो.’ नमाज पूरी होते ही मौलवी चीखा.
‘नहीं, मैं तो मामूली कुत्ता हूं….वही कह रहा हूं जो मुझे ईश्वर या अल्लाह, जो भी नाम तुम उसको दो, ने बताया है.’
‘झूठ! अल्लाह हमें छोड़कर तुझसे बात करेगा.’ मौलवी चिल्लाया. फिर वह बाकी नमाजियों की ओर मुड़ा, ‘दोस्तो, इसका दिमाग फिर गया है…मारो.’
कुछ देर पहले जिस मस्जिद में शांति थी, वहां ‘मारो-मारो’ आवाजें गूजने लगीं. लोग पत्थर उठाकर कुत्ते को मारने दौड़े. उसे एक बार फिर दौड़कर जान बचानी पड़ी.
‘लोग अपने धर्म पर अटल हैं. ईश्वर को ही चाहिए कि वह इनसे समझौता कर ले.’ कुत्ते ने निष्कर्ष निकाला और दुबारा ईश्वर के सामने उपस्थित हो गया. ईश्वर उस समय काम में डूबे हुए थे,
‘लोग अपने-अपने धर्म में डूबे हुए हैं. आपको उनकी भक्ति-भावना का सम्मान करना चाहिए.’ कुत्ते ने ईश्वर से कहा. सुनकर ईश्वर मुस्कराया. बोला—
‘तुम फिर धोखा खा गए. लोग धर्म नहीं, उसके नशे में चूर हैं. इसलिए मुझे उनकी हरकतें देख क्षोभ हो आता है.’
कुत्ते की समझ न आया कि आगे क्या कहे. वह उल्टे कदमों लौटने लगा.
ओमप्रकाश कश्यप

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