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ईश्वर – दो

भरे पेट कुत्ता मजे से जा रहा था कि ईश्वर से टकरा गया—
‘बहुत खुश नजर आ रहे हो, लगता है आज किसी मालदार भक्त ने भोग चढ़ाया है?’ ईश्वर को देखकर कुत्ते ने कटाक्ष किया.
‘हां, कुछ लोग कहते हैं कि मेरे भक्तों में बहुत-से धनवान हैं.’
‘क्या आप नहीं मानते?’
‘मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ है?’
‘कमाल है, पहले तो छप्पर फाड़कर उनके गोदाम भर देते हो; जब कोई गरीब पूछता है कि दूसरे के पास उसकी जरूरत से कहीं अधिक क्यों है, तो कहते हो कि यह उसके पूर्व जन्मों के पुण्य का प्रताप है. उसने ढेर सारा दान दिया था, इसलिए इस जन्म में उसे बेशुमार धन मिला है. इसपर जब गरीब कहता है कि निर्धन होने के कारण मैं तो दान कर नहीं करता, यानी अगले जन्म में भी कोई उम्मीद नहीं है तो तुम बगलें झांकने लगते हो.’
‘मेरे लिए तो सभी एकसमान हैं?’ ईश्वर सचमुच बगलें झांकने लगा था.
‘फिर मुझे कुत्ता क्यों बनाया?’ कुत्ते ने हमला जारी रखा.
‘मैंने तो सिर्फ प्राणी बनाया था.’ ईश्वर ने सफाई दी.
‘बिना नाम का?’
‘मुझे नाम की जरूरत नहीं पड़ती.’
‘क्या तुम हर एक को बिना नाम के पहचान लेते हो?’
‘जो कुछ खास करता है, वह खुद नजर में आ जाता है.’
‘चलो मान लिया. मुझे कुत्ता ही बनाना था तो कुत्ते की जगह कोई और नाम सोचा होता?’
‘यह उससे पूछो जिसने तुम्हें नाम दिया है.’
‘यानी तुमने कुछ नहीं किया?’
‘मुझे कुछ भी करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.’
‘मगर लोग तो यही कहते हैं कि तुम इस दुनिया को चलाते हो.’
‘सिर्फ वही लोग यह दावा करते हैं, जिन्हें इस दुनिया को अपनी तरह चलाना होता है.’
‘और बाकी लोग?’
‘वे इन बातों की परवाह नहीं करते.’
‘फिर दुनिया कैसे चलती है?’
‘चलते रहना दुनिया का स्वभाव है.’
‘अगर ऐसा है तो फिर कभी मत कहना कि मेरी पूजा करो.’
‘मैंने यह पहले भी कभी नहीं कहा?’
‘फिर ये मंदिर-मस्जिद किसलिए हैं?’ कुत्ता हैरान था.
‘ये तो उन्होंने बनवाए हैं जो मेरे बहाने अपनी पूजा कराते हैं, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों पर सवारी गांठना चाहते हैं.’
‘तुम ढोंगी हो.’
‘यदि तुम्हें इसी से शांति मिलती है तो यही मान सकते हो. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.’
‘ईश्वर क्या ऐसा सचमुच ऎसा होता है.’
‘मैं तो ऎसा ही हूं.’ ईश्वर की मुस्कान और भी गहरी हो गई.
कुत्ते ने ईश्वर के बारे में अब तक जो सुना था, यह उसके बिलकुल विपरीत था. मन में संदेह बढ़ा तो वह उसपर भौंकने लगा. ईश्वर निरपेक्ष भाव से आगे बढ़ता गया.
ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “ईश्वर – दो

  1. बहुत उत्तम कथा…एक बेहद जरूरत का कार्य….
    साधुवाद…

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