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समझौता

भूख से व्याकुल कुत्ता भोजन की खोज में यहां से वहां भटक रहा था. उसको अपने पुराने मालिक की याद आ रही थी, जहां उसको भरपेट मिलता था. देखभाल के लिए नौकर था. मालिक उसको अपने साथ गाड़ी में घुमाने ले जाता था.
‘खुद को क्रांतिकारी समझ लेना, पागलपन की निशानी है. अगर में वहीं टिका रहता तो आज का यह दिन तो न देखना पड़ता.’
‘छि: कुत्ता होकर कुत्ते जैसा सोच भी… कुत्ते ने खुद को लताड़ा. उसको सहसा याद आया. किसी ने कहा था—‘रोटी के लिए गुलाम होने से अच्छा है, भूख में तड़फ-तड़फकर जान दे देना.’ किसने कहा था, यह वह दिमाग पर लाख जोर डालने पर भी याद नहीं कर पाया.
सड़क से गुजरते हुए उसकी नजर एक होटल पर पड़ी. अपने पिछले मालिक के साथ वह कई बार होटल आ चुका था. शायद दरबान उसको पहचान ले. यही सोचकर वह होटल की ओर बढ़ा. मगर दरबान ने उसको देखते ही उसपर अपनी बंदूक तान दी. वह जान बचाकर भागा. उसको मालूम था, कि होटल का बासी, बचा हुआ खाना कहां फेंका जाता है. वहां पर सड़कछाप कुत्तों को आपस में झगड़ते हुए भी देख चुका था. भूख से व्याकुल उसके कदम उसकी ओर बरबस मुड़े, पर कुछ ही कदम के बाद वह फिर जड़ हो गए.
‘उन सड़कछाप कुत्तों में से कई तो मुझे पहचानते हैं.’ कुछ देर तक मन उलझन में रहा. पर विजय भूख की ही हुई.
‘जान रहेगी तभी तो मान-सम्मान रहेगा. आखिर आपद-धर्म भी कोई चीज है.’ कुत्ते ने मन को समझाया. धीरे-धीरे चलता हुआ वह होटल के पिछवाड़े पहुंचा. शहर की गंदगी जैसे झुग्गियों में सिमट जाती है, वैसे ही होटल की गंदगी उसके पिछवाड़े राज करती है, कुत्ता जानता था. वह पीछे पहुंचा तो हमेशा की तरह कुत्तों को झगड़ते हुए पाया. उसे देखकर भी कुत्तों ने अनदेखा कर दिया. लड़ते रहे आपस में. कुत्ते को हैरानी हुई. पर मन में झिझक बनी रही. भूख को दबाते हुए वह पल-भर वहीं खड़ा रहा. तभी न जाने कहां से चार-पांच बच्चे आए और उस कबाड़ में ढूंढने लगे. जैसे उन सड़कछाप कुत्तों ने उसको देखा, आपस में लड़ना छोड़कर वे एक ओर हो गए.
वह अब भी अपने स्थान पर खड़ा रहा. तभी उनमें से एक कुत्ता उसके पास आया,
‘देखता क्या है, भूख लगी है तो खा ले. अमीरों लोग बिगाड़ते हैं, तभी तो हम जैसों का पेट भर पाता है, पर ध्यान रहे, उन बच्चों से दूर ही रहना. अपने पेट की भूख मिटाने के लिए उन्हें डरा मत देना.’
इतना कहकर वे कुत्ते एक ओर भाग गए.
ओमप्रकाश कश्यप

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