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पुजारी

गांव में सेठ ने एक मंदिर बनवाया और उसकी देखभाल के लिए एक पुजारी रख दिया.

‘सेठ बहुत दयालु हैं, उनकी आत्मा बड़ी पवित्र है…’ सेठ उस मंदिर में रोजाना पूजा के लिए आता. उसे देखते ही पुजारी कहने लगता—‘आपका प्रताप अक्षुण्ण रहे. लक्ष्मी जी की इतनी कृपा रहे कि कुबेर के खजाने की चमक भी फीकी पड़ जाए.’ सेठ को यह सुनकर अच्छा लगता. सेठ खुश होकर बढ़-चढ़कर दान देने का प्रयास करता.

धीरे-धीरे उस मंदिर पर आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ती चली गई. जो भी आता, वह चढ़ावे के रूप में कुछ न कुछ लेकर ही आता. पुजारी कुछ खाता, बाकी को बेचकर जमा करता जाता. किसी धनवान भक्त को आते देख चिल्लाने लगता—

‘दान किए से ही धन बढ़ता है, शास्त्रों में लिखा है कि….बहन जी भीड़ मत करिए, चलते जाइए…दूसरों को भी दर्शन करने का मौका दीजिए…भाई साहब आप प्रसाद रखकर आगे बढ़ जाइए…’ दरअसल पुजारी ने कभी शास्त्र पढ़े नहीं थे, इसलिए वह उनका नाम लेने से भी हिचकता. बात को किसी न किसी बहाने घुमा देता. या उसको बीच ही मैं छोड़कर आगे बढ़ जाता. उस समय अगर कहीं सेठ भी आता दिख जाए तो बात को आगे बढ़ाने का अच्छा बहाना मिल जाता— ‘दूर क्यों जाते हैं, सेठजी को ही देख लीजिए…जितना दान-पुण्य करते हैं, उतनी ही लक्ष्मी प्रसन्न होती जाती हैं…’ कुत्ता पुजारी की बातें सुनता, सेठ को आते-जाते भी देखता. पर किसी से कुछ कहे बगैर भक्तों के हाथ से छूट गिरे प्रसाद को खाता रहता.

अचानक सेठ का आना बंद हो गया. कुत्ता रोज उसकी राह देखता. उसके रास्ते पर आंखें बिछाए खड़ा रहता. जब कई दिन बीत गए तो वह सेठ का हालचाल जानने के लिए उसकी हवेली की ओर निकल पड़ा. मालूम पड़ा कि सेठ को एक व्यापार में भारी घाटा हुआ था. उसके चार बेटे थे. चारों विलासी, स्वार्थी और कामचोर. सबकी नजर सेठ की दौलत पर थी. व्यापार में घाटा हुआ तो चारों को बहाना मिल गया. उन्होंने मिलकर सलाह की सेठ को व्यापार और संपित्त से बेदखल कर दिया. महीने में लाखों कमाने वाला सेठ रोटी के लिए अपने बेटों पर निर्भर होकर रह गया. उस दिन उसको रोटी देने के नाम पर भी चारों बेटे लड़ पड़े थे. कुत्ते ने अपने मुंह से सेठ को दुत्कारते हुए सुना. अपने ही बेटों द्वारा. उसका मन हुआ कि झपटकर चारों की बोटी-बोटी नोंच डाले. तभी सेठ को मंदिर की ओर जाते देखा तो कुत्ता भी उसके पीछे-पीछे चल दिया.

दिन चढ़े का समय. मंदिर के आगे भक्तों की भीड़ लगी हुई थी. पुजारी ने सेठ को आते हुए देखा तो हमेशा की तरह जोश से भर गया—

‘इन सेठजी को देखो, क्या कमी है. धनमाया के भंडार भरे पड़े हैं. दौलत इतनी है कि कुबेर के खजाने से भी इकीस पड़े. ऊपर से आज्ञाकारी बेटे और बहुएं. इस असार संसार में आदमी को और क्या चाहिए. यह सब दान की महिमा है…दान की. जो दान करेगा. उसका धन दनादन बढ़ेगा.’ सेठ के कान में पुजारी के शब्द पड़े तो उसके कदम ठिठक गए. उसने अपनी राह बदल ली.

कुत्ते को भूख लगी थी. वह प्रसाद की लालच में अपने देखे भाले ठिकाने की ओर दौड़ा. झपटा. लेकिन सूंघकर छोड़ दिया. खाने की हिम्मत ही न पड़ी.

उसके बाद मंदिर की ओर न कभी सेठ झांका, न कुत्ता.

ओमप्रकाश कश्यप

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2 comments on “पुजारी

  1. धर्म कर्म तो अच्छी बात है किन्तु स्व विवेक भी बहुत महत्वपूर्ण है.

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