1 टिप्पणी

निष्ठा

उस दिन बड़ी मुश्किल से जान बची.

अब किसी गरीब के घर जाकर रहूंगा.’ कुत्ते ने चलतेचलते निर्णय लिया. गरीब की खोज में चलतेचलते वह एक झोपड़ी के सामने रुका. किसान की झोपड़ी थी वह. भीतर से झगड़े की आवाजें आ रही थी.

फसल आने में अभी छह महीने बाकी हैं, जबकि अनाज चार महीने से अधिक नहीं चलेगा. इसलिए आज से तुम मेरा खाना आधा कर दो. वैसे भी इस बुढ़ापे में भूख लगती कहां है?’ भीतर किसान अपनी पत्नी को समझा रहा था.

ऐसा कैसे हो सकता है, जी. दिनभर मेहनत करते हो. पेटभर खाने को नहीं मिलेगा तो काम कैसे करोगे. मैं तो पूरे दिन घर पर रहती हूं. हर रोज एक वक्त भी खाऊं तो कुछ नहीं बिगड़ने वाला.’

तू खाती ही कितना हैदिन में कुल आठ रोटियां सेकती है, उनमें से छह तो मैं ही खा जाता हूं. पेटू कहीं का. मेरा तीन से भी काम चल सकता है…’

बस जी, रातदिन पसीना बहाने वाले तुम रोटियां नहीं खाओगे तो क्या मैं खाऊंगी…’ कुत्ता बाहर खड़ा उनकी बातें सुनता रहा.

इनके तो अपने ही खाने के लाले पड़े हैं. बेचारे मुझे कहां से खिलाएंगे. कुत्ता वहां से बढ़ने को हुआ. उसी समय उसके जी में न जाने क्या आया कि उसके पांव ठिठक गए, ‘अभी तक मैंने अमीरी का सुख भोगा है. गरीबी में कुछ न कुछ तो जरूर होगा, जिससे ये इतने खुश हैं. फिर मेरा क्या. हट्टाकट्टा हूं. किसी भी तरह अपना पेट भर सकता हूं.’ इतना कहकर उसने झोपड़ी का द्वार खटखटाया. भीतर से किसान और उसकी पत्नी बाहर आए. कुत्ते को सामने देख उन्होंने एकदूसरे की ओर देखा. यह देख कुत्ते को अपने ऊपर ग्लानि होने लगी—

मैंने चुपके से तुम्हारी बातें सुनी हैं, अभी तक मैं एक बड़े नेता के घर था. वहां हर वक्त अघाया रहता था. तुम्हारी बात सुनकर जाना कि गरीबी में भी आनंद है. अगर इजाजत दोगे तो मैं तुम्हारी झोपड़ी के आगे पड़ा रहूंगा.’

किसान और उसकी पत्नी के मुंह से बोल न फूटा.

घबराओ मत, मैं तुमपर बोझ नहीं बनूंगा. दोनों एकएक टुकड़ा भी निकाल दोगे तो मैं जी लूंगा.’ कुत्ता बोला.

किसान दंपति की चुप्पी अटूट बनी रही.

बहुत स्वार्थी हो तुम लोग.’ किसान और उसकी पत्नी को चुप देख कुत्ते का धैर्य टूटने लगा, ‘आपस में तो एकदूसरे के लिए तो तुममे से हर एक भोजन छोड़ने को तैयार है, परंतु मेरे लिए एक टुकड़ा निकालने में भी तुम्हारी जान निकल रही है.’

अब कैसे समझाऊं तुम्हें, इस झोपड़ी में पिछले तीन दिन से खाना नहीं बना. ऐसे में तुम्हारे नाम का एक टुकड़ा भी कहां से आएगा.’

झूठ, अभीअभी तो तुम कह रहे थे कि तुम्हारे घर में चार महीने का अनाज है. कुत्ता नाराज हो गया.

किसान हूंयह तो कह ही नहीं सकता कि घर में अनाज नहीं है, नहीं तो लोग धरती की उर्वरता पर भरोसा करना ही छोड़ देंगे.’ किसान ने कहा. और अपनी हथेलियों में अपना मुंह छिपा लिया.

कुत्ता कुछ देर खड़ाखड़ा सोचता रहा. फिर झोपड़ी के दरवाजे के सहारे जाकर अपनी पूंछ द्वारा जमीन साफ की और वहां इतमिनान से बैठ गया.

 ओमप्रकाश कश्यप

Advertisement

One comment on “निष्ठा

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: