Archive | अप्रैल 2009

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ईश्वर

Version:1.0 StartHTML:0000000168 EndHTML:0000014781 StartFragment:0000000471 EndFragment:0000014764 एक कुत्ता मरकर स्वर्ग पहुंचा. उसके पुण्यों को देखते हुए उसको ईश्वर की सेवा में लगा दिया गया. कुत्ते को ईश्वर के घर तक पहुंचाने के लिए एक यमदूत उसके साथ कर दिया गया. ‘सुनो, ईश्वर के सामने पूछ मत हिलाना…उन्हें चमचागिरी कतई पसंद नहीं है.’ ‘पर मैं तो कभी […]

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शापग्रस्त

Version:1.0 StartHTML:0000000168 EndHTML:0000013820 StartFragment:0000000471 EndFragment:0000013803 एक  कमंडलधारी माथे पर मोटा–सा तिलक लगाए कहीं जा रहा था. एक कुत्ता सामने से आकर उसपर भौंकने लगा. ‘मूर्ख! मुझपर भौंकता है. जानता नहीं कि मैं पुजारी हूं. शाप दे दूं तो यहीं भस्म हो जाएगा.’ ‘तुम स्वयं शापग्रस्त हो. फिर मुझे भला क्या शाप दोगे?’ कुत्ते ने हंसकर […]

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सबसे ताकतवर शब्द

महान चीनी दार्शनिक कन्फ्युशियस अपने मित्रों के साथ सत्य की खोज में निकला हुआ था. साथ में थे उसके बीस जिज्ञासु साथी. जिनमें व्यापारी, किसान, मजदूर, दस्तकार, गरीब और अमीर सभी शामिल थे. वे सभी कन्फ्युशियस को अपना गुरु मानते थे. तीन महीनों तक उनकी यात्रा निरंतर चलती रही. इस बीच कन्फ्युशियस अपने चिंतन-मनन में […]

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भगवान तो अमीरों ने गढ़ा है

    फत्तु उठ! जंगल–झाड़े जा. जल्दी वापस आ. हाथ–मुंह धोने में, खाने में, पीने में, नहाने और बाल संवारने में—वक्त मत चटका. सूरज उग आया? या रात है बाकी? मत देख—मत सोच. खुद को देख, अपनी भूख को देख. जीवन की बदहाली, घर की तंगहाली को देख. काम देख, काम का दाम मत देख. […]

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गंदा है, पर धंधा है

Version:1.0 StartHTML:0000000168 EndHTML:0000023472 StartFragment:0000000471 EndFragment:0000023455 कुत्ते का मन बस्ती से ऊबा तो सैर–सपाटे के लिए जंगल की ओर चल पड़ा. थोड़ी ही दूर गया था कि सामने से यमराज को आते देख चौंक पड़ा. भैंसे की पीठ, चारों पैर, पूंछ, सींग और माथा सब तेल और सिंदूर से पुते हुए थे. तेल इतना अधिक कि […]

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जनतंत्र में जूते

Version:1.0 StartHTML:0000000168 EndHTML:0000035524 StartFragment:0000000471 EndFragment:0000035507 जूते आजकल नई भूमिका में हैं. अभी तक इन्हें फैशन की वस्तु माना जाता था. आजकल विरोध प्रदर्शन का औजार बनने लगे हैं. पहले कलम को लोकतंत्र का पहरुआ माना जाता था. जहां भी कोई चूक देखी, दन से अखबार में लिख मारा. बड़ी–बड़ी तीसमारखां ताकतें भी कलम से कांपती […]

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अतृप्त आत्माओं के चुनावी संकल्प

  चुनावों का मौसम है. जिधर देखो उधर अतृप्त आत्माएं विचर रही हैं. सेवा करने का एक अदद मौका मिले तो मन को तृप्ति हासिल हो. सबके पास अपनी पार्टी और उसकी दी गई कुर्सी है. जिसके पास पार्टी नहीं है, उसने पार्टी बना ली है. इस देश में वोटर मिलना कठिन है, पार्टी बनाना […]

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सहना मां की आदत है

Version:1.0 StartHTML:0000000168 EndHTML:0000038537 StartFragment:0000000471 EndFragment:0000038520 फत्तु उठ. हाथ–मुंह धो. झोला उठा. काम पर चल. मां से कह चा बनाए. रोटियां सेके, देर न करे. जल्दी–जल्दी हाथ चलाए. कमीज का बटन टूटा है, मां से कह, तुरंत आकर टांके. चप्पल नहीं मिल रही. कह, खोज कर लाए. अरे, रूमाल भी गायब है. मां को बता. वही […]

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सनक, ना चीन्है ठांव-कुठांव-दो

उस समय भी वे सनकाए हुए थे. सनक की खनक के साथ-साथ यात्रा आगे बढ़ रही थी. मंत्री जी नई सनक थी पागलों के बीच भाषण देकर उन्हें अपना बनाने की. देश में पागलों की संख्या कम नहीं. कवि-कलाकार और दूसरे ऐसे ही संस्कृति-कर्मियों, सरकार से लोककल्याण की अपेक्षा रखने वालों तथा इन मुद्दों पर […]

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सनक, ना चीन्है ठांव-कुठांव: एक

कल झंडियां लगाते-लगाते थक गया था फत्तु! चल आज एक कहानी सुन… नेताओं के हजार हाथ…हजार शौक…पर अपने मंत्रीजी का बस एक ही शौक. बात-बात में सनकाने का. जैसे मंत्री जी लाजवाब, वैसे ही उनकी सनकें भी लाजवाब होतीं. एक से बढ़कर एक. सनकाने के हजारों हजार तरीके. नए और अनोखे. मौके-बेमौके वह ऐसे-ऐसे सनकाते…ऐसे-ऐसे […]

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