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कहानी की तलाश

एक कुतिया अपने बच्चे के साथ लेटी थी. रात का समय था. तभी  उसका पिल्ला कहने लगा—

नींद नहीं आती मां, कोई कहानी कह जो रात कटे.’

तो जगबीती सुन.’ कुतिया ने कहानी छेड़ दी— ‘एक आदमी था….’

बसबस रहने दे मां! अब तू कहेगी कि वह ईमानदार था. मेहनती और सच्चा था. अपने पड़ोसियों से प्यार करता था. वक्तजरूरत में उनके काम भी आता था. फिर तू कहेगी कि एक और आदमी था. झूठा और बेईमान. निकम्मा और कामचोर. बातबात पर झगड़ने वाला. लोग उससे दुखी थे.’

कहानियां तो ऐसी ही होती हैं, आदमी भी तो ऐसी ही कहानियां सुनाता है.’

जानता हूं मां. पर ये भरे पेट की कहानियां हैं. इन कहानियों से कुछ नहीं बदलता.’

तो फिर…?’

कोई नई कहानी सुना. जिसमें सब कुछ बदलाबदला हो.’

ऐसी कहानी तो मैंने कहीं सुनी नहीं.’

तो हम ऐसी ही किसी कहानी की खोज करेंगे. क्यों मां?’

मैं तो बहुत थक चुकी हूं बेटा….’ तेरा साथ दे पाना मुश्किल है.’

ठीक है. तो तू आराम कर मैं नई कहानी की तलाश में जाता हूं.’

मां रोकती रही. मगर पिल्ला सुबह होते ही नई कहानी की खोज में चल दिया. कई दिनों तक वह चलता रहा. उधर मां इंतजार करती रही. एक दिन पिल्ला लौटा तो उसे देखते ही कुतिया की बांछें खिल गईं.

बेटा तू जिस कहानी की तलाश में गया था वह मिली क्या?’

मिली तो मां, लेकिन….!’ पिल्ला कहतेकहते चुप हो गया.

बात क्या है, बेटा?’

दुनिया में कहानियां तो बहुत मिलीं मां, मगर हर कहानी इंसान की हवस की दास्तान थी. उनको सुनतेसुनते मैं तो इतना ऊब गया मां कि अब मुझे कहानियों से ही नफरत होने लगी है.’

मेरा अच्छा बेटा, आ बैठ मैं तुझे लोरी सुनाती  हूं.’

हां मां कुछ ऎसा सुना जो सिर्फ हमारा अपना होकहते हुए पिल्ला अपनी मां से सट  गया.

ओमप्रकाश कश्यप

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