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अपना-अपना धर्म

पुरानी बस्ती में लौटने पर कुतिया ने राहत की सांस ली. सब बच्चों को साथ देख उसको तसल्ली हुई. उसने इधरउधर नजर घुमाई. जैसे किसी को खोज रही हो. मन में थोड़ी निराशा पनपी. मगर जल्दी ही उबर गई. दूर से चलकर आने के कारण शरीर थका हुआ था. इसलिए कुछ देर आराम करने का सोच वहीं जमीन पर लेट गई. बच्चों में से कुछ मां के पास बैठ गए बाकी इधरउधर खेलने लगे.

      थोड़ी देर बाद कुतिया की आंखें खुलीं. उसने फिर अपने आसपास देखा. मन बेचैन हो उठा—‘तुम्हारे पिता नहीं दिख रहे, यह ठिकाना उन्हें बहुत ही प्रिय है, कहीं भी हों, घूमफिरकर यहां लौट ही आते हैं. यहां तक कि परसों मैंने जब उनसे साथ चलने को कहा, तो इस जगह के छूटने के डर से उन्होंने फौरन मना कर दिया था.’

     ‘हम सब मिलकर उन्हें खोजते हैं.’ बड़ा पिल्ला जो एक जगह बैठेबैठे परेशान हो रहा था, बोल पड़ा. तय हुआ कि सब गांव की अलगअलग गली में जाएंगे. पूरा गांव उनका देखाभाला है, इसलिए एक घंटे के भीतर वापस लौटने में किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए. किसी को यदि गांव में जाना है, तो एक बार यहां आकर, खबर देने के बाद ही जाएगा.

    ‘जिसे भी मिलें, उन्हें एकबार यहां लिवाकर लाना है?’ कुतिया ने चलने से पहले सबको समझाया.

    ‘अगर वे न आएं तो?’ एक पिल्ले ने शंका प्रकट की.

     ‘ऐसा क्यों सोचते हो. वे तो स्वयं हमसे मिलने को उत्सुक होंगे. वे मेरे अपने और तुम सबके जन्मदाता हैं.’ कुतिया ने विश्वासभरे स्वर में कहा.

     ‘परसों जब हम यहां से जाने वाले थे तो उन्होंने हमें कितना रोका था. कह रहे थे कि अपना घर अपना ही होता है. यहां के हर आदमी, पशुपक्षियों, यहां तक कि घरगली की मिट्टी से भी हमारा नाता है. हम उनके साथ सुखदुःख में सम्मिलित होते रहे हैं. ये सब हमारे अपने हैं. उस समय तो तुम पर नई बस्ती में जाने की धुन सवार थी. अब उन्हें भी तो नाराज होने का अधिकार है.’ एक बच्चे ने कुतिया पर फब्ती कसी.

    ‘मुझे भी लग रहा है कि मैंने गलती की थी. इसका मुझे अफसोस है. अपनी भूल के लिए मैं उनसे क्षमा मांगने को तैयार हूं. अब तुम जाओ, अगर वे आने से इनकार करें तो मुझे बताना, मैं स्वयं उन्हें लिवाकर लाऊंगी. आखिर हम दोनों वर्षों से पतिपत्नी हैं.’

    उसके बाद सारे पिल्ले गांव की गलियों में फैल गए. खुद कुतिया ने भी एक दिशा पकड़ ली. एक घंटे के तयशुदा समय के बाद सब वहीं वापस लौटे. सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं. कुतिया सबसे अधिक व्यथित थी.

    ‘मैंने गांव की प्रत्येक गली, घर में जाकर उन्हें खोजने की कोशिश की. मगर वे कहीं नहीं मिले.’ सबसे बड़े पिल्ले ने बताया. इसके बाद सब यही दोहराने लगे.

     ‘मैंने तो यह भी सुना है कि कल किसी गाय ने उनके पेट में सींग घुसा दिया था. जिससे उन्हें बहुत गहरी चोट आई थी. महान श्वान देवता उनकी रक्षा करें, इस समय वे न जाने कैसी हालत में हैं.’ कुतिया दुःखी मन से बोली.

    ‘मैंने भी यही सुना है. बल्कि मैं तो उस गाय को ढूंढने के लिए गलियों के चक्कर भी लगा आया. अगर मिल जाए तो उसका पेट ही फाड़ डालूं. इतनी जोर से काटूं कि भविष्य में किसी भी कुत्ते को देखकर उसकी घिग्गी बंध जाया करे.’ एक पिल्ला गुस्से से आगबबूला हो रहा था.

    ‘गाय की छोड़ो, पहले अपने पिता की तलाश करो, मुझे घबराहट हो रही है.’

     ‘मैंने उन्हें ढूंढ लिया है, वे उस ओर हैं.’ एक नन्हा पिल्ला जिसने कुछ ही दिन पहले चलना सीखा था, जोर से चिल्लाया. फिर तो सब उसी दिशा में भाग छूटे. नन्हा पिल्ला भी पीछेपीछे हो लिया. कुछ देर बाद उन्होंने जो देखा, उससे सबकी आंखें फटी की फटी रह गईं. गाय घायल होकर जमीन पर पड़ी थी. कुत्ता उसके पास बैठकर रखवाली कर रहा था.

    ‘तुम यहां, हमने तुम्हें कहांकहां नहीं ढूंढा!’ कुतिया शिकायतभरे स्वर में बोली. फिर जवाब का इंतजार किए बिना ही बोली, ‘क्या यह वही गाय है जिसने कल तुम्हारे पेट में सींग घुसा दिया था. अगर ऐसा है तो बताओ, हम सब मिलकर अभी इसको मजा चखाए देते हैं.’

     ‘कुछ तो सोचसमझकर बोला करो, माना कि यह वही गाय है, परंतु कल जब इसने मुझपर हमला किया उस समय यह गांव के कुछ शरारती बच्चों से परेशान होकर भाग रही थी. बीच रास्ते में मैं पड़ गया. तब इसने बदहवासी में मुझपर हमला कर दिया. वह तो बस एक क्षणविशेष था. अभी यह बेहोश है. होश में आएगी, तो अपनी भूल पर जरूर पछताएगी.’

     ‘इसे हुआ क्या है, हमें देखकर नाटक तो नहीं करने लगी!’ कुतिया का गुस्सा अब भी बाकी था.

    ‘फिर वही बात. यह बेचारी तो खुद जिंदगी से तंग आ चुकी है. जब तक दूध देती थी, तब तक इसका मालिक इसे खूब खिलातापिलाता और देखभाल करता था. बूढ़ी होते ही उसने इसको घर से निकाल दिया. अब इसको पेट भरने के लिए दरदर भटकना पड़ता है. कभी बच्चे छेड़ते हैं, कभी शैतान कुत्ते पीछे पड़ जाते हैं. कल भी यही हुआ. पहले तो बच्चों ने खूब छकाया, उसके बाद गली के कुत्ते इसका पीछा करने लगे. उनसे जान बचाने के लिए यहां इस गडढ़े में जा गिरी. काफी चोट आई है. चलफिर भी नहीं सकती. जब मैं इधर से गुजरा तो देखा कि कौए इसे परेशान कर रहे थे. मुझसे रहा न गया, इसलिए यहां बैठ गया.’

    ‘तुम्हें क्या पड़ी है, इसका मालिक आकर अपने आप देखेगा…!’ कुतिया ने गुस्से में कहा, मगर अगले ही पल जैसे सब समझ गई हो, बोलीµ ‘इसकी हालत देखकर वह हरामखोर भला क्यों आने लगा. उसको तो जल्दी होगी कि कैसे इसका दम निकले और वह खाल बेचकर कुछ कमाई करे.’

    ‘तुम जो कह रही हो, संभव है वही सही हो.’ कुत्ते ने दृढ़तापूर्वक कहा.

     ‘क्या कल की बात पर नाराज हो? मैं आगे कभी तुम्हें अकेले छोड़कर नहीं जाऊंगी.’ कुतिया ठंडी पड़ती हुई बोली.

     ‘तुमने बुरा क्या किया. कुएं के मेंडक की तरह एक ही जगह टिके रहने से अच्छा है, दुनिया देखो. मुझे नहीं पता कि एक दिन में तुमने क्या देखा, क्या नहीं. पर कल तुम्हारे जाने के बाद मुझे समझ आई कि प्राणी यदि चलता रहे तो नई संभावनाएं भी बनती चली जाती हैं. इसलिए मैंने निर्णय लिया है कि आगे मैं तुम्हें अकेला कभी न जाने दूंगा. जहां भी जाएंगे, साथसाथ जाएंगे.’ कुत्ता सहजभाव से बोला.

     ‘ठीक है, अब तो चलो, तुम्हारी चिंता में सुबह से बच्चों ने भी कुछ नहीं खाया है.’

     ‘मैं नहीं जा सकता, तुम सब जाओ?’

     ‘फिर वही बात, जब इसके मालिक को ही इसकी चिंता नहीं है, तो तुम क्यों मर रहे हो?’ इस बार सबसे बड़े पिल्ले ने कहा, जो भूख से व्याकुल नजर आ रहा था.

     ‘इसके मालिक का क्या धर्म है, यह तो वही जाने, लेकिन मेरा अपना धर्म रखवाली करना है, जब तक यह ठीक नहीं हो जाती, तब तक मैं कहीं नहीं जाऊंगा.’

     ‘यह कोई नई बात तो नहीं, तुम शुरू से ही बहुत जिद्दी हो.’ कुतिया के स्वर में अभिमानमिश्रित वेदना थी. उसके बाद वह बच्चों को संबोधित कर बोली—‘चलो बच्चो, हम सब गांव जाकर तुम्हारे पिता के लिए भोजन का प्रबंध करते हैं.’

     उसके बाद वे सब गांव की ओर चल दिए.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

 

 

 

 

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