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खुद बुरा तो जग भी बुरा

कुतिया  का जी खट्टा हो चुका था. उसे पूरी बस्ती एक कैदखाना लगने लगी. लेकिन बच्चे तो बच्चे थे. थोड़ी देर बाद सब भूलभालकर फिर धमाचैकड़ी मचाने लगे.

मां, एक बात बता, आदमी क्या सचमुच इतना ही बुरा है.?’ एक पिल्ले ने प्रश्न उछाला.

नहीं बेटा, अगर चारों तरफ बुराई ही बुराई हो तो यह दुनिया एक पल भी न टिक सके. शायद इसीलिए मेरी मां कहा करती थी—‘खुद बुरा तो जग भी बुरा.’ कुतिया स्मृतियों में डूब गई.

मैं समझा नहीं, मां?’ पिल्ले ने उसका ध्यान भंग किया.

बेटा हर बात समझाई नहीं जा सकती. ऎसी बातों को वक्त के लिए छोड़ देना चाहिए.’

और वक्त कब समझाता है, मां?’

यह तो वक्त ही जाने बेटा. उसपर किसी का जोर नहीं चलता.’

एक पिल्ला बड़ा हो चुका था. वह चाहता था कि उसकी मां उसे उसके पिता यानी एक वयस्क कुत्ते जितना ही सम्मान दे. पर मां थी कि उसको अब भी निरा बच्चा समझती. अपने बड़ेपन का एहसास दिलाने के लिए वह जबतब किसी पर भी भौंकने लगता था. उस दिन राह चलतेचलते उस पिल्ले की नजर एक लड़के पर पड़ी. लड़का था गोलमटोल. उसकी भारीभरकम काया देख छोटे पिल्लों की हंसी छूटने लगी. इसपर कुतिया ने उन्हें रोका. मगर बड़ा पिल्ला नहीं माना. वह लड़के पर गला पखारने लगा. लड़का घबराकर भीतर की ओर भागा. उसकी हालत देख पिल्ले का मजा दुगुना हो गया. वह दरवाजे के करीब पहुंचकर गला फाड़ने लगा. तभी एक आदमी भीतर से मोटासा डंडा लेकर बाहर निकला. उसने गुस्से में डंडा घुमाया. अगर उस समय पिल्ला भाग न जाता तो डंडा उसके माथे को चटका देता. कुतिया समेत बाकी पिल्ले भी भाग छूटे. घबराहट में वे अलगअलग रास्तों पर मुड़ गए.

बचतीबचाती कुतिया चैराहे पर पहुंची. उसने अपने चारों ओर नजर दौड़ाई.

परिवार के साथ हमेशा ज्यादा सावधानी की जरूरत पड़ती है. उस समय हमारी एक चूक पूरे परिवार को संकट में डाल सकती है.’ वह बच्चों को समझाने लगी.

मां बड़का नहीं दिख रहा?’ एक पिल्ले ने ध्यान दिलाया.

वह थोड़ा शरारती जरूर है, पर है समझदार, आ जाएगा. हम सड़क के उस ओर खड़े होकर उसकी प्रतीक्षा करेंगे. चलो अब दाएंबाएं देखकर, वाहनों से बचते हुए सड़क पार करो.’ कुतिया बच्चों को साथ ले सावधानीपूर्वक आगे बढ़ने लगी. वे सड़क पार करके, दूसरी ओर गए ही थे कि कुछ दूरी पर एक चीख सुनाई पड़ी. कुतिया का दिल दहल गया. उसकी नजर सड़क पर छटपटाते हुए पिल्ले पर पड़ी. ऐसी दुर्घटनाएं वह पहले भी देख चुकी थी. उसका मन आशंकाओं से घिर गया. दिल में तूफान उठने लगे. लेकिन व्यस्त सड़क पर रुकना खतरे से खाली नहीं था. इसलिए वह बच्चों को लेकर सुरक्षित स्थान की तलाश में दौड़ पड़ी.

दौड़ते हुए वे एक पार्क में पहुंचे. सबकी सांसें धौंकनीसी चल रही थीं. थकान उतारने के लिए वे एक पेड़ के नीचे बैठ गए. सभी उदास थे, शोकसंतप्त और शांत. मौन उस समय उनका सबसे बड़ा सहारा था. कुतिया कुछ देर के लिए सबकुछ भूलकर बड़के की यादों में खो जाना चाहती थी. तभी छोटा पिल्ला चिल्लाया—

मां उस ओर देखो….!’ कुतिया ने गर्दन उठाई. आश्चर्यजनक रूप से वह बड़का ही था, जो लंगड़ाता हुआ उन्हीं की ओर आ रहा था. कुतिया ने भी उसकी ओर दौड़ लगा दी. मां के पीछे बच्चे भी दौड़ पड़े.

तू सुरक्षित है मेरे लाल.’ करीब आते ही कुतिया ने पूछा.

हां मां, पर तू ठीक ही कहती थी…’ बड़का अपनी धुन में बोला.

क्या बेटा?’ कुतिया असमंजस में पड़ गई.

यही कि खुद भला तो जग भी भला.’

नहीं, मां तो कहती थी—खुद बुरा तो जग भी बुरा.’ छोटा पिल्ला बीच में बोल पड़ा.

एक ही बात है बेटा.’ कुतिया ने समझाया. फिर बड़के की ओर मुड़ी, ‘ये पट्टी कहां से बंधी?’

टक्कर लगते ही मैं तो खुद को मरा हुआ मान चुका था. घायल पड़ा सोच रहा था कि अब किसी भी पल कोई और गाड़ी मेरे ऊपर से गुजरेगी और तुरंत मेरा काम तमाम हो जाएगा. मैं अपनी मां से माफी भी नहीं मांग पाऊंगा. उसी समय एक भलामानस मेरी ओर दौड़कर आया. भरी सड़क पर खुद को खतरे में डालकर उसने मुझे अपनी गोदी में उठा लिया. उसके बाद मेरी आंखें खुलीं तो मैं डा॓क्टर के पास था. मेरी टांग पर ये पट्टी बंधी हुई थी. मां आज एक बात और समझ में आई?’

कौनसी बात बेटा?’

वक्त से बड़ा शिक्षक कोई नहीं.’

हां, और वक्त से बड़ा शिकारी भी कोई नहीं होता.’ कुतिया ने जोड़ा, ‘अब चलो, सब मिलकर भोजन की तलाश करें, तेरे गम में किसी ने सुबह से न कुछ खाया न पिया. कहते हुए कुतिया एक ओर मुड़ी तो उसका परिवार भी पीछेपीछे दौड़ पड़ा.

ओमप्रकाश कश्यप

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3 comments on “खुद बुरा तो जग भी बुरा

  1. वक्त से बड़ा शिक्षक और शिकारी कोई नहीं – वाकई कुत्तों की ये पंचतांत्रिक कहानियाँ अद्भुत हैं! लिखने और प्रकाशित करने के लिये धन्यवाद!

  2. बहुत ही प्रेरक कहानी है आभार्

  3. adbhut , kutton ke bhaane aapne insaaono ko seekh dene waalee bahut umdaa kahaanee sunaai, bahut achha laga, aapk blog bhee sundar hai.

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