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गुलाम

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क कुत्ता अपने परिवार के साथ विचरण कर रहा था. साथ में कुतिया थी, उसकी पत्नी, और छोटेबड़े कई बच्चे भी. जिनमें तीन नर थे, बाकी मादा. परिवार के छोटे बच्चे अपने स्वभाव के अनुसार रास्ते में शरारत करते हुए चल रहे थे. कुत्ता कभी उन्हें फटकारता, कभी पीठ थपथपाकर आगे बढ़ने का हौसला देता.

व्यस्त चैराहा पार करने के बाद जैसे ही वे एक बस्ती में घुसे, छोटे बच्चे वहां बड़ेबड़े, शानदार मकानों को देखकर हैरान रह गए.

मां, क्या हम कुछ दिनों तक यहां नहीं रह सकते?’ एक बच्चे ने पूछा.

नहीं मेरी बच्ची, यह बस्ती हम जैसों के लिए नहीं है?’ मां ने सहजभाव से उत्तर दिया.

क्या इन लोगों को कुत्तों से कतई प्यार नहीं है?’

ऐसा नहीं है, इनमें से अधिकांश घरों में कुत्ते हैं, जिन्हें उनके मालिक खूब प्यार करते हैं—और उनको अपने घर की शान समझते हैं. लेकिन वे हमसे अलग हैं.’

जब कुत्ते हैं तो हमसे अलग कैसे हुए मां?’ दूसरा बच्चा बोला. फिर तो उस बहस में दूसरे बच्चे भी शामिल हो गए.

मैंने सुना है कि आदमी जातिपांति में विश्वास करता है, क्या हम कुत्तों में भी…’

हम जानवर है बेटा, अपने मुंह से आदमी की बुराई कैसे करें…’ कुत्ता जो अभी तक चुप था, बोला.

साफसाफ क्यों नहीं कहते कि आदमी के साथ रहतेरहते कुत्ते भी जातियों में बंट चुके हैं.’ कुतिया सहसा उग्र हो उठी.

मैंने उन्हें देखा है, वे हमसे अलग हैं. उनमें से कोई भेड़िये के डीलडौल वाला, बहुत ही डरावना है. कोई एकदम खरगोश के बच्चे जैसा, छोटा, नर्ममुलायम सफेदझक्क बालों वाला, जो सिर्फ ‘कूंकूं’ करना जानता है. फिर भी आदमी उन्हें बहुत प्यार करता है.’ बड़े बच्चे ने कहा.

भेड़िये जैसे डीलडौल वाला तो ठीक है. चोरउच्चके उसको देखते ही घबरा जाते होंगे. लेकिन खरगोश के बच्चे जैसा कुत्ता पालने की कौनसी तुक है. उनसे अधिक रखवाली तो मैं भी कर सकता हूं.’ एक बच्चे ने ताल ठोकी.

बेटा, ऐसे कुत्ते रखवाली के लिए नहीं पाले जाते….’ कुत्ता धीरगंभीर स्वर में बोला.

तो फिर…?’ एक साथ कई बच्चे बोल पड़े.

बड़े आदमियों का अहम् उनसे भी बड़ा होता है बेटा. वही उनके भीतर डर बनकर समाया होता है. इसी कारण वे अपने भीतर इतने सिमट जाते हैं कि उनके लिए पड़ोसियों से बात करना तो दूर, परिवार के सदस्यों के बीच आपस में संवाद करने का भी समय नहीं होता. बाहर से तनेतने नजर आने वाले वे लोग भीतर से एकदम अकेले और वीरान होते हैं. पालतू कुत्ते उनके खालीपन को भरने के काम आते हैं.’

मां तू इस बस्ती से जल्दी बाहर निकल. जो आदमी अपनों का सगा नहीं है, वह हम कुत्तों के साथ क्या संबंध निभाएगा.’ एक पिल्ला घबरायासा बोल पड़ा.

मुझे तो इन आदमियों के साथसाथ यहां के कुत्तों पर भी तरस आ रहा है, जो आदमी की गोदी में पड़ेपड़े चुपचाप किकयाते रहते हैं. मन होने पर किसी पर भौंक भी नहीं सकते…’ दूसरे पिल्ले ने कहा.


गुलाम कहीं के…‍’ दूसरे ने साथ दिया और आसमान की ओर मुंह करके जोरजोर से भौंकने लगा.

कुत्ताकुतिया बिना कुछ कहे, दूसरी ओर मुड़ गए.

 

मप्रकाश कश्यप

 

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2 comments on “गुलाम

  1. आदमी अपने ही अहम् का गुलाम बनकर कुत्ते के उपहास का कारण बन रहा है – इससे दुख की बात और क्या हो सकती है?

  2. भगवान ने अन्‍य प्राणियों की तुलना में अलग तरह का शरीर , दिमाग और मन दिया था हमें .. क्‍या हमलोग उस ढंग से सोंच पा रहे हें .. आपकी कहानियां पढकर कुछ सोंचने को मजबूर हो रही हूं मैं भी ।

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