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जनतंत्र में जूते

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जूते आजकल नई भूमिका में हैं. अभी तक इन्हें फैशन की वस्तु माना जाता था. आजकल विरोध प्रदर्शन का औजार बनने लगे हैं. पहले कलम को लोकतंत्र का पहरुआ माना जाता था. जहां भी कोई चूक देखी, दन से अखबार में लिख मारा. बड़ीबड़ी तीसमारखां ताकतें भी कलम से कांपती थीं. ये वे दिन थे जब यार लोग बड़ी शान और अभिमान से गाया करते थे—

न तीर निकालो, न तलवार निकालो

जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो

ये वे यार लोग थे जो हाथ में टूटी कलम और फटी नोटबुक लेकर खबरों की तलाश में चप्पलें चटकाते रहते थे. पैदल या साइकिल पर. चप्पल इसलिए कि जूते खरीदने की हैसियत अखबार के मालिक की भी नहीं होती थी. लोगों तक खरीखरी खबरें पहुंचाना यार लोगों का शगल हुआ करता था. इसलिए ज्यादातर तो फोकट में ही खबरनबीसी कर लिया करते थे. अखबार उन दिनों लोगों तक खबरें पहुंचाते थे. लालाओं का माल नहीं बेचते थे.

बदले जमाने में कलम तो मालिक लोग नौकरी देते समय ही गिरवी रखवा लेते हैं. उसकी जगह अब कीबोर्ड ने और नोटबुक की जगह लैपटाप ने ली है. पत्रकारों को बंधेबंधाए वेतन की जगह पैकेज दिया जाता हैं, आउटडोर कवरेज के लिए कंपनी की गाड़ी भी. उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है कि खबर की जगह विज्ञापन लाएं. अखबार अब जूतों का विज्ञापन छापते हैं और अपने कर्मचारियों को इतनी पगार भी देते हैं कि वे अपने लिए ब्रांडेड जूते खरीद सकें. न दें तो कंपनियां ही उन्हें भेंट कर देती हैं, ताकि उनका प्रोडेक्ट खबरों की बचीकुची जगह भी हथिया सके. पैकेज पर पलने वाले ये पत्रकार अपना जमीर घर पर छॊड़कर आते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब सरकार से सुविधाएं ऐंठने और अनियंत्रित काम करने की इजाजत देने तक सीमित रह गई है.

आजकल बाजार के हिसाब से जरूरतें पैदा की जाती हैं. जैसे अमेरिका लगातार युद्ध की संभावनाओं को विस्तार देता रहता है, ताकि हथियारों की बिक्री से देश पर आई आर्थिक मंदी की लंबीचौड़ी खाई को पाटा जा सके. इसके लिए मीडिया ओबामा की नई छवि गढ़ रहा है. एक विवेकवान, धैर्यवान और व्यवहारकुशल नेता की. ताकि बाद में उन्हें वह बदनामी न झेलनी न पड़े जो जार्ज बुश को इराक युद्ध के बाद झेलनी पड़ी थी.

पता नहीं, बराक ओबामा पर फेंका गया जूता किस कंपनी का था. और चिदंबरम पर फेंके गए जूते की कंपनी से उसका क्या संबंध है. भारत में एक के बाद एक जूता फेंको अभियान की प्रस्तुतियों ने एक बार फिर जाहिर कर दिया है कि हम दुनिया का सबसे बड़ा नकलची जनतंत्र हैं. हम ऐसी किसी भी घटना की नकल तुरंत तैयार कर लेते हैं, जिससे अमेरिका जुड़ा हो.

यह भी संभव है कि समाज में कलम की उत्तरोत्तर घटती साख पर किसी बहुराष्ट्रीय जूता कंपनी के व्यापार प्रबंधक की निगाह जा अटकी हो. जूता फेंको अभियान के माध्यम से वह बाजार में अपना एकदम नया प्रोडेक्ट उतारना चाहता हो. हो सकता है कि बहुत जल्दी एक सुंदर, सजीला, मुलायम और डिजायनर जूता खासतौर से ऐसे अवसरों के लिए बाजार में उतारने की उसकी योजना हो. ताकि जो पत्रकार कलम के साथसाथ अपनी जुबान भी गिरवी रख चुकें हैं, उन्हें जूता के माध्यम से अपने चैनल को होड़ में बनाए रखने का अवसर मिल सके. ताकि तेज रफ्तार समाचारों के बीच उदघोषक कवरेज की जीवंत फोटो के साथ, एक के बाद क्रम में लगातार दुहरातिहरा सके—

ये देखिए, यह नीले रंग का डिजायनर जूता मंत्री महोदय पर हमारे संवाददाता निर्बुद्धिसेन की ओर से फेंका गया थानिर्बुद्धिसेन जी, क्या आप हमारे दर्शकों को बताएंगे, उस विशेष क्षण के बारे में जब आपने वह जूता फेंका था?’

जीउस समय मंत्री महोदय और उनके आसपास बैठे लोगों की निगाहें मेरे ऊपर ही टिकी थीं. मेरे बाएं कंधे पर कैमरा लटका हुआ था और दाएं कधे पर लटके झोले में जूता था, जिसकी तस्वीर आपने अभीअभी दर्शकॊं के सामने पेश की है. उस समय सभी यह अनुमान लगा रहे थे कि अपने चैनल की ओर से मैं किस कंपनी का बना जूता फेंकता हूं. तभी मैंने दन से दे मारा…’

मंत्री महोदय को आपका यह जूता लगा था और यदि लगा था तो कहां लगा था?’

देखिए मदिरा जी, ऐसे कार्यक्रमों के लिए जिस कंपनी का बना जूता हमारा चैनल उपयोग करता है, वह कंपनी अपना हर एक जूता काफी शोध और मेहनत के बाद, इस तरह तैयार करती है कि वह ठीक निशाने पर लगे. कैमरे की पकड़ में आए और जिसपर जूता फेंका जाना है, उसको किसी प्रकार का नुकसान भी न हो…?’

निर्बुद्धिसेन जी हमारे पास समय बहुत कम है और हमारे दर्शकों की रुचि यह जानने में है कि आपका फेंका हुआ जूता मंत्री जी को लगा भी था या नहीं; और यदि लगा था तो कहां लगा था…?’

‘…जी हमारा उद्देश्य किसी को चोट पहुंचाना या उसकी भावनाओं का मजाक उड़ाना नहीं है, दूसरे हमारे मंत्री जी काफी अनुभवी हैं, वे ऐसे कार्यक्रमों में अक्सर जाते ही रहते हैं. इसलिए मैंने जो जूता फेंका, वह लगने से पहले ही उन्होंने लपक लिया था.’

एकदम ठीक कहा आपने, हमारा उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं है.’

निर्बुद्धिसेन जी चलतेचलते हमारे दर्शकॊं को यह और बता दीजिए कि उस क्षण जब आपने मंत्री जी पर जूता फैंका था, उस समय आपकॊ कैसा महसूस हुआ था?’

अत्यंत रोमांचकारी!’

ये थे हमारे संवाददाता निर्बुद्धिसेन जी जिन्होंने आज मंत्री जी पर सबसे पहले जूता फेंकने का कमाल हासिल किया था, उनका जूता मंत्री ने लपक लिया.’ इसके तुरंत बाद दर्शकॊं की जेब और विवेक पर कतरनी चलाता हुआ जूता कंपनी का हसीन विज्ञापन भी देखने को मिल सकता है.

ओमप्रकाश कश्यप

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One comment on “जनतंत्र में जूते

  1. लोगों की आवाज को नहीं दिया स्थान।
    चोट नहीं जूता करे करता है अपमान।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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