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अतृप्त आत्माओं के चुनावी संकल्प

 

चुनावों का मौसम है. जिधर देखो उधर अतृप्त आत्माएं विचर रही हैं. सेवा करने का एक अदद मौका मिले तो मन को तृप्ति हासिल हो. सबके पास अपनी पार्टी और उसकी दी गई कुर्सी है. जिसके पास पार्टी नहीं है, उसने पार्टी बना ली है. इस देश में वोटर मिलना कठिन है, पार्टी बनाना आसान. एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब देश में जितने वोटर हों, उतनी ही राजनीतिक पार्टियां भी बन जाएं और हारजीत का फैसला उम्मीदवारों के बीच कबड्डी मैच से कराना पड़े. अतृप्त आत्माओं का मानना है कि पार्टी की कुर्सी से सिर्फ पार्टीसेवा हो सकती है. जिन्हें देशसेवा करनी है, उन्हें देश की कुर्सी भी चाहिए. ये न महात्मा गांधी हैं, न बाबा आम्टे. जो मामूली लोगों की सेवा से तृप्त हो जाएं. इन्हें ऊंचे दर्जे की सेवा करनी है. उसके लिए ऊंचे दर्जे की कुर्सी भी चाहिए.

ऐसी ही एक आत्मा रास्ते में भटक रही थी. टोकने से पहले ही बोल पड़ी—

मैं छोटीमोटी सेवाओं में विश्वास नहीं करता. जो करता हूं, डंके की चोट करता हूं.’

वह कौन खुशनसीब होगा, जिसकी आप सेवा करेंगे?’

मेरा ध्येय एकदम स्पष्ट है. संसद में जाकर बेचारे अंबानी बंधुओं के लिए कुछ कर सकूं…’ मैं चौंक पड़ा.

अंबानी बंधु और बेचारे! उन दोनों के पास तो अरबों डा॓लर की संपत्ति है. बड़ा भाई देश का सबसे बड़ा अमीर है. छोटे का नंबर भी पांचवेछठे पर आता है. बड़ा देश के सबसे महंगे इलाके में अपने किलेनुमा महल में रहता है और अपनी पत्नी के जन्मदिन पर हेलिका॓प्टर भेंट करता है. इस देश के बीस करोड़ से अधिक लोग झोपड़ियों में रहते और प्रतिदिन बीस रुपये से भी कम कमाते हैं. दूसरी ओर उन दोनों के खजाने में हर मिनट लाखों जुड़ जाते हैं.’

ईर्ष्या, तुम उनमें से हो जो दूसरों को फलताफूलता देख ही नहीं पाते, जिन्हें आधा भरा हुआ गिलास देखकर संतोष करने की शिक्षा दी जाती हैभले आदमी तुम सिर्फ उनकी वर्तमान संपत्ति देख रहे हो, यह नहीं सोच रहे कि मात्र एक साल में उन बेचारों की आधे से अधिक दौलत बाजार की भेंट चढ़ चुकी है. क्या यह उनपर तरस खाने की बात नहीं है?’

जानकार बता रहे हैं कि शेयर बाजार की हकीकत कुछ और थी, निवेशक को लुभाने के लिए हर कंपनी अपनी बैलेंस शीट बढ़ाचढ़ाकर कर दिखा रही थी. एक सत्यम का सच बाहर आ गया. पर अभी न जाने कितने सत्यम झूठ के बल पर अपना कारोबार जमाए बैठे हैं. बाजार ने तो सबको उनकी हकीकत बताई है कि जिस नाव को चांदी की समझा था, वह पुराने काठ की है. इससे लोगों का बाजार से भरोसा उठ चुका है, तुम उसको कैसे वापस लाओगे?’ मुझे उनकी बातों में मजा आने लगा था’

भरोसा जमाने में कितनी देर लगती है. पूरे पांच साल कोसने वाला मतदाता आखिर चुनावों में तो भरोसा करता ही है.’

दूसरे नेता मतदाताओं का मन जीतने के लिए सपने बेचते हैं. इस तरह खुलेआम एक पूंजीपति का समर्थन करके तुम उनका मन कैसे जीत पाओगे?’

जनता का मन जीतकर मुझे मिलेगा भी क्या. अंबानी का समर्थन करके ज्यादा न सही दोचार पूंजीपतियों से मोटा चंदा तो पा ही सकता हूं…’ कहकर वे मुस्कराते हुए आगे बढ़ गए. मैं उनके बारे में सोचता रहा. थोड़ी दूर ही आगे बढ़ा था कि एक और चुनावी जीव टकरा गया. मैंने पूछ लिया– ‘चुनाव जीतने के लिए तुम्हारा क्या कार्यक्रम है?’

कुछ नहीं, पर्चा भरूंगा. पांचछह दिन धूमधाम करूंगा. अपने पक्ष में माहौल बनाऊंगा और फिर जो उम्मीदवार सबसे ज्यादा देगा, उसके पक्ष में बैठ जाऊंगा.’

यह तो लोकतंत्र में धोखादड़ी हुई. पब्लिक क्या सोचेगी?’

चाहे जो सोचे. मेरे लिए तो यह सीधासादा धंधा है, दस दिन में एकदो लाख लगाकर दसबीस लाख बटोर लाने का.’

चलतेचलते एक और अतृप्त आत्मा से भेंट हो गई. मैं दो आत्माओं से आजिज आ चुका था, इसलिए तीसरी से बात करने का कतई मन नहीं था. उससे बचकर निकल ही जाना चाहता था कि उसने टोक दिया

इन चुनावों में तुम अपना वोट किसे देने जा रहे हो?’

अभी कुछ तय नहीं किया.’ मैंने उसके विचित्रसे प्रश्न को टालने का प्रयास किया.

तय करने की जरूरत भी नहीं है.’ उन्होंने कहा.

भला क्यों? मतदान करना तो हमारा कर्तव्य है.’

एकाध चुनाव में अपना कर्तव्य भूल भी जाओगे तो पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा. देश तो आखिर चल ही रहा है न!’

आखिर कोई वजह तो हो?’ मैने हैरानी जताई.

वजह एकदम साफ है, देश में ऐसी कौनसी पार्टी नहीं है, जिसके आगे मैं टिकट मांगने नहीं गया, लेकिन किसी ने भी ‘हां’ नहीं भरी. जिस चुनाव में मैं नहीं, उसमें तुम वोट देकर भी क्या करोगे.’

सो तो ठीक है, तुम्हारी अपनी पार्टी भी तो है, उसी से खड़े हो जाओ?’

यही तो मुश्किल है. मैंने तुम्हें बताया नहीं, मेरी देखादेखी तुम्हारी भाभी ने भी अपनी राजनीतिक पार्टी गठित कर ली है. उसने सोच लिया है कि अगर मैं अपनी पार्टी से चुनाव लड़ूंगा तो वह भी मैदान में उतर पड़ेगी. फिर तो मेरी जानपहचान के सारे लोग उसी को वोट देंगे. जो बात अभी तक पर्दे में है, वह सबके सामने आ जाएगी.’ मेरे पास उनके चेहरे पर उतरती उदासी को दूर करने का कोई उपाय नहीं था. अगर आपके पास हो तो उनकी मदद जरूर करें. अतृप्त आत्माएं कभी भी आपके दरवाजे पर दस्तक देने आ सकती हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

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2 comments on “अतृप्त आत्माओं के चुनावी संकल्प

  1. बहुत सुंदर व्‍यंग्‍य … सही कहा … इन अतृप्‍त आत्‍माओं को तृप्‍त करना हमारा पहला कर्तब्‍य होना चाहिए।

  2. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद
    ओमप्रकाश कश्यप

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