टिप्पणी करे

सनक, ना चीन्है ठांव-कुठांव: एक

कल झंडियां लगाते-लगाते थक गया था फत्तु! चल आज एक कहानी सुन…

नेताओं के हजार हाथ…हजार शौक…पर अपने मंत्रीजी का बस एक ही शौक. बात-बात में सनकाने का. जैसे मंत्री जी लाजवाब, वैसे ही उनकी सनकें भी लाजवाब होतीं. एक से बढ़कर एक. सनकाने के हजारों हजार तरीके. नए और अनोखे. मौके-बेमौके वह ऐसे-ऐसे सनकाते…ऐसे-ऐसे सनकाते…कि नर और नारी…चमचे और दरबारी, विवाहित और ब्रह्मचारी सब अचरजा जाते. उस समय नर-नारी जय-जयकार करते, चमचे बलंैया लेते, दरबारी चारणगीत गाते.
एक दिन मंत्री जी ने सुबह-सुबह महात्मा गांधी का चित्र क्या देखा कि एकाएक सनका गए. तुरंत ठान लिया कि अपने भाषण में सिर्फ सच कहेंगे और सच के सिवा कुछ नहीं. उस दिन जहां भी गए, मुंह से एक भी बोल न फूटा. पूरे दिन वे जगह-जगह घूमे, पर बात जब सच कहने की आती तब मुंह घुग्गा-सा बंध जाता. बिना कोई शब्द वापस लौट आए. बात साधने के लिए चमचों और दरबारियों को कोई न कोई बहाना करना पड़ता. पूरे दिन मंत्री जी मौन और चमचे गला फाड़-फाड़ कर जनता के बीच स्पष्टीकरण देते रहे. हालत खराब हो गई उनकी. रोज मंत्री जी गला फाड़ते रहते थे. आज उन्हें समझ में आया कि वे क्यों चमचे हैं, और मंत्राी जी क्यों मंत्री. दिन भर के अभार से परेशान मंत्री जी भी थे, सो घर आते ही अपने सचिव को बुलाया-
‘आज दिन बड़ा ही मनहूस निकला….!’
‘सर, मंगलवार है न, यह दिन तो हमेशा से ही मनहूसियत की पहचान रहा है….’
‘अरे, आज तो हमारी पत्नी का जन्मदिन भी है!’
‘वैरी हैप्पी डे सर! चैदह सितंबर यानी आज का दिन तो मेरे लिए भी लकी रहा है.’
‘पहली बार है जब हमें अपने भाषण के लिए एक भी शब्द नहीं मिला….क्या हमारे राज्य से ‘सच’ सचमुच ही लापता हो चुका है.’
‘आपके जीवन में तो सिवाय सच के कुछ है ही नहीं सर! रही राज्य की बात, प्रदेश में हमारी सरकार तो है नहीं, इसलिए सच के लापता होने को लेकर रिपोर्ट लिखाई जा सकती है.’
मंत्रीजी की सनक ने विस्तार लिया और सच के गायब होने को लेकर पहले रिपोर्ट कराई गई. लेकिन पुलिस समझदार थी. डीआईजी और भी समझदार. रिपोर्ट लिखते ही पल्ला झाड़ दिया- ‘सर! यह तो सीबीआई का मामला बनता है. केंद्र में अपनी ही सरकार है, मैं लिखे देता हूं, आप कहें तो मामला सीबीआई को सौंपने से कोई न नहीं कह पाएगा.’
पर सरकार में बैठे प्रतिद्विंद्वी मंत्री को उनकी मांग के पीछे पार्टी पा छा जाने की साजिश नजर आई. उसने अडंगा लगाया. हमारे वाले मंत्री जी एक बार फिर सनका गए. सच के लापता होने की जांच सीबीआई से कराने की मांग लेकर वे राजघाट पर धरने पर जा बैठे. सरकार झुक गई. मामला सीबीआई को सौंप दिया गया. मंत्रीजी की सनक की जीत हुई. तीन महीने बाद सीबीआई ने रिपोर्ट सौंप दी. जैसी की उम्मीद थी, रिपोर्ट गोलमोल थी, इसलिए उसकी समीक्षा के लिए एक कमेटी बना दी गई. तब तक मंत्री जी अपनी नई सनक की यात्रा पर निकल चुके थे.
एक बार उन्हें सनक चढ़ी मुस्कराने की. उठते-बैठते, खाते-पीते, हर मंच, प्रत्येक सभा में वे अपनी मुस्कान बिखेरते नजर आते. जनता को मुस्कुराते हुए मंत्रीजी अच्छे लगते थे, इसलिए उनके प्रशंसकों की संख्या भी बढ़ने लगी. जनता में प्रभाव पड़ता देख कई मल्टीनेशनल कंपनियां उनके लिए विज्ञापन का न्योता लेकर पहुंचने लगीं. इससे उनके विरोधियों में खलबली मच गई. उन्हें अपने सपने धराशायी होते जान पड़े. विपक्षी थे, इसलिए जानते थे कि सत्तापक्ष के गुब्बारे में कैसे पिन चुभोयी जा सकती है. अगले ही दिन विपक्ष के सबसे बड़े नेता का वक्तव्य आ गया, जिसने मंत्री जी की मुस्कान को मायूसी में बदल दिया.
‘मंत्री जी की मुस्कराहट पड़ोसी मुल्क के प्रधानमंत्री से मेल खाती है.’
दोनों देशों के राजनीतिक संबंध उठापटक वाले थे. मामला उलट भी जा सकता था. अब मंत्रीजी इतने नासमझ तो थे नहीं कि जो सनकें उनके लिए वोट बैंक रचने का काम करती हैं, उन्हीं के लिए अपनी कुर्सी दाब पर लगा दें, इसलिए मंत्री जी ने अगले दिन चुपचाप उस सनक को पटखनी दे दी.
ऐसे ही न जाने किस घड़ी की बात, मंत्रीजी को शौक लगा छींकने का. उस समय वे खास दौरे पर निकले हुए थे. धूल-भरे रास्ते पर कार हिचकोले खाती हुई जा रही थी कि अचानक- ‘आ…ऽ..ऽ…ऽ….छीं!’ मंत्री जी की छींक क्या थी कि मानो कोई नामुराद चट्टान पहाड़ से खिसकर समंदर में जा गिरी हो. या किसी राक्षस ने पीपल के पुराने पेड़ को चर्र से चीर डाला हो.
भीमकाय छींक का दीर्घकाय असर हुआ. कार हिली. टकराने से बाल-बाल बची. जनप्रतिनिधि की छींक अकेली तो हो ही नहीं सकती थी. पीछे चल रही गाड़ियों के काफिले में चल रहे चमचे दरबारियों ने चलती कार को बदचाल देख होनी को भांप लिया. सबसे पहले अनुसरण की परंपरा का पालन करती हुई सेक्रेटरी की सींक-सी पतली, मिमयाती हुई छींक निकली. मंत्री जी के तो केवल पेट ने भूचाल झेला था. सेक्रेटरी सशरीर भूचाल में फंस गया. सेक्रेटरी के बाद बाकी चमचों दरबारियों की छींक एक के बाद एक कदमताल करने लगीं. काफिले में दो-चार नेत्रियां भी थीं. उनका काम मंत्राी जी को सफर के दौरान ‘हल्का’ करते रहना था. इस कोशिश में कभी-कभी वे अपना ही वजन बढ़ा लेती थीं. उनकी भी नर्म-मुलायम छींक भी हवा में लहराईं…जैसे बच्चे पानी पर कागज की नाव तैराएं.
‘काम बन गया…!’
‘वाह! सिरीमान खुद कामयाबी की मिसाल हैं.’ चमचों से सुर में सुर मिलाया.
‘आप के रहते काम की मजाल ही क्या कि बिगड़ जाए…’ बेसुरे दरबारी भी सुर में चहके.
‘वो काम ही क्या जो आपके रहते बन न पाए…’
मंत्री जी बात को ज़ज्बात और ज़ज्बात को करामात बनाना जानते थे. इसलिए मुस्कराए. छींक का छौंक मुस्कान में बदल गया.
क्रमश:

Advertisement

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: