न जाने किस डर से ईश्वर की नींद टूट गई. पति को पसीना-पसीना देख ईश्वर पत्नी ने पूछा—
‘क्या हुआ प्रिय!’ ईश्वर की धड़कनें तेज थीं. एकाएक कुछ बोल न पाया. पत्नी ने दुबारा वही प्रश्न किया तो डरा-घबराया बोला—
‘मैंने सपने में देखा, बहुत सारे लोग, भूख, नंगे, नरकंकाल की तरह मेरी ओर दौड़े चले आ रहे हैं….!’
‘ऐसे लोगों से आप भला क्यों डरने लगे?’
‘सब के सब गुस्से में थे. अपनी दुर्दशा के लिए मुझे कोसते हुए. कोई मुझे तानाशाह कह रहा था, कोई परजीवी और कोई….’
‘और क्या कह रहे थे?’ पति की घबराहट ने ईश्वर-पत्नी को भी डरा दिया.
‘कह रहे थे….ईश्वर को मंदिर में रहना है, रहे. हम आजाद हैं. आज के बाद वही करेंगे, जो हमें सही लगेगा. किसी के बहकावे में नहीं आएंगे.’
‘पुजारी से कहो, समझाए. तुम्हारे नाम का चढ़ावा वही तो खाता है.’
‘उसने भी हाथ खड़े कर दिए. कह रहा था मैं उसी को भरमा सकता हूं जो सोया हुआ हो. जागे हुए इंसान को भरमाना मेरे बस की बात नहीं है.’
‘उसने ऐसा कहा?’
‘हां, जागे हुए लोग भाग्य के भरोसे रहना छोड़ देते हैं.’
‘अब हमारा क्या होगा?’
‘लोग जाग रहे हैं. हमें भी जाग जाना चाहिए.’
‘मैं समझी नहीं?’
‘मैं तो लोगों के भ्रम से जन्मा हूं. यदि भ्रम ही नहीं रहा तो हम कहां?’
‘फिर!’
‘फिर क्या? भ्रम की मौत तो एक न एक दिन निश्चित है.’ कहकर ईश्वर ने गहरी चुप्पी साध ली.
ओमप्रकाश कश्यप
बहुत ही गहरी और मारक कहानी है।
आपके ब्लोग की चर्चा गर्भनाल पत्रिका मे भी है और यहाँ भी है देखिये लिंक ………http://redrose-vandana.blogspot.com