कहानी आर्यवृत्त की है. वहां कलयुग के राजा ने आलीशान महल बनवाया. सागर तट पर बनी उस 27 मंजिला इमारत में सैकड़ों कमरे थे. महल में सोने के प्रस्तर थे, चांदी की छड़ें. महंगे आयातित कालीन. झाड़-फानूस, रंगीन लाइटें. आयातित मार्बल से बने स्नानगृह, आसमान की थाह मापने के लिए चार-चार उड़नखटोले.
इमारत तैयार होने पर लिफ्ट में सवार होकर कलयुग का राजा महल की सबसे ऊंची छत पर मुआयना करने पहुंचा. गर्व से उसका सीना चैड़ा हो गया. अपने दोनों हाथ ऊपर उठा, आसमान की ओर मुंह कर बोला—
‘देखा पिता जी, अब यह आसमान मेरी मुट्ठी में है.’ ऊपर से कोई आवाज न आई. परंतु कलयुग के राजा का दर्प न घटा. उसने नीचे झांका. सड़क पर गाड़ियां, मनुष्य कीड़े-मकोड़ों की तरह नजर रेंगते हुए आए. उसका सीना और भी चौड़ा हो गया.
‘ये सब मेरे लिए ही उठते-बैठते और खाते-कमाते हैं. मैं इस देश और इन सबका भाग्य-विधाता हूं.’
सहसा उसकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. लगा कि आसपास हजारों आदमी भूख से कराह रहे हैं. पूरी इमारत उनके रुदन से थर्रा रही है. चांदी की छड़ें जो उसने बड़े मान से लगवाई थीं, वे स्लम बस्तियों से आने वाली करुणाद्र हवा से बेआब हो चुकी है. वह घबराकर लिफ्ट की ओर दौड़ा. लेकिन वहां भी आलमे बेनूरी थी. डर से उसने अपनी आंखें बंद कर लीं. अचानक उसके कानों में लोगों की सिसकियां गूंजने लगीं. उसको लगा मानो भूख से पीड़ित लाखों लोग उस इमारत के नीचे दबे पड़े हैं. उसकी कराह से इमारत की नींव डगमगा रही है.
राजा के साथ चल रहे सेवकों ने उसको जैसे-तैसे नीचे उतारा. पर कलयुग के राजा की तबीयत न सुधरी. अगले दिन एक नजूमी ने राजा की तबीयत और इमारत दोनों का मुआयना किया.
‘महाराज, इमारत मनहूस है.’
‘हमने तो सारे वास्तुदोष भूमि पूजन से पहले ही दूर करा लिए थे.’
‘इमारत में पूरब की ओर कम खिड़कियां हैं. उधर की हवा का न आना ही सारे दोष की जड़ है.’
‘ऐसा क्या है उस हवा में?’
‘महाराज आप बहुत व्यस्त रहते हैं. यदि अवसर तो शांत मन से उस हवा को सुनने की कोशिश करना. उसमें से मधुर संगीत उभरता सुनाई देगा. फिर बीच से एक आवाज….फिर उस सुरीली आवाज में एक मंत्र….मनुष्यता का मंत्र!
‘मनुष्यता का मंत्र?’
‘हां, मनुष्यता का मंत्र यानी जियो और जीने दो.’
‘यह कहां बिकता है?’ कलयुग के राजा के खरीदने-बेचने के अभ्यस्त दरबारी ने पूछा.
नजूमी हंसता हुआ वहां से चल दिया.
‘पागल है.’ नजूमी के जाते ही कलयुग के राजा के दरबारियों ने उसे समझाने की कोशिश की. राजा को दरबारियों की बात अच्छी लगी. लेकिन उस इमारत की ओर झांकने की उसकी हिम्मत फिर कभी न पड़ी. आज भी वह इमारत वीरान पड़ी है. जब भी उसका ख्याल कलयुग के राजा के मन में आता है, कानों में हजारों भूखे-नंगे, बेसहारा, फुटपाथी लोगों की चीखें गूंजने लगती हैं.
ओमप्रकाश कश्यप