शहर की भीड़भाड़ से उकताया हुआ कुत्ता जंगल की ओर चल दिया. बस्ती से बाहर आते ही उसकी निगाह एक औरत पर पड़ी, सिर पर लकड़ियों का बड़ा-सा गट्ठर उठाए वह शहर की ओर जा रही थी. गट्ठर भारी होने के कारण उसे चलने में परेशानी हो रही थी.

इतना कठिन जीवन जीने वाला मनुष्य यदि स्वयं को पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ प्राणी समझता है तो उसे इसका पूरा अधिकार है.’ कुत्ते ने मन ही मन कहा. अकेलेपन से बचने के लिए वह स्त्री के पीछे-पीछे चलने लगा. उसी समय कुत्ते ने सामने से ईश्वर और ईश्वर-पत्नी को आते देखा. ईश्वर-पत्नी को उस स्त्री पर दया आई

क्या तुम्हारे घर मैं कोई और कमाने वाला नहीं है?’ ईश्वर-पत्नी ने करुणाद्र स्वर में पूछा.

पति हैं, पहले बाहर का सारा काम वही देखते थे. मगर कुछ महीने पहले जंगल में लकड़ी बीनने आई औरतों को बचाने के लिए वे एक सांड से जूझ पड़े थे. सांड ने औरत को गिरा ही दिया था. लेकिन वह स्त्री को कुचल पाए उससे पहले ही उन्होंने उसे एक ओर कर दिया. इसपर सांड झल्लाकर उनपर टूट पड़ा. और उनके संभलने से पहले ही उसने उन्हें अपने सींगों पर उठाकर पटक दिया. घायल अवस्था में भी वे सांड से उस समय तक जूझते रहे जब तक कि सांड हार मानकर वहां से भाग न गया. मगर उस लड़ाई में उनका एक पैर खराब हो गया. अब वे बाहर आ-जा नहीं सकते. इसलिए घर का काम देखते हैं. जंगल का काम मुझे संभालना पड़ता है.’ औरत ने बोझ से दबी जा रही गर्दन को सीधा करते हुए कहा.

ईश्वर-पत्नी अपने पति से बात करने लगी. कुछ देर बाद आगे आकर बोली

तुम शायद समझ चुकी होगी, मेरे पति ईश्वर हैं. वे चाहें तो तुम्हें सुखमय जीवन का आशीर्वाद दे सकते हैं. उसके बाद तुम्हारे सारे कष्टों का अंत हो जाएगा.’

पर मुझे तो कोई कष्ट नहीं है.’

सिर पर बोझ का गट्ठर लेकर चलना क्या कम कष्टदायक है?

वह तो हमारे रोज का काम है.’ औरत ने सहज भाव से बताया.

तुम चाहो तो अपने पति के स्वस्थ होने का वरदान मांग सकती हो.’

‍‘उनकी पत्नी होने के नाते मैं तो यही चाहती हूं कि वे जल्दी से जल्दी पहले की तरह स्वस्थ्य होकर चलने लगें. इलाज कर रहे डा॓क्टर ने विश्वास भी दिलाया है. हम दोनों दिन में अतिरिक्त परिश्रम करते हैं, ताकि इलाज के लिए जरूरी रकम जुटा सकें. हमें विश्वास है कि बहुत जल्दी…’

उनके वरदान के बाद डा॓क्टर की जरूरत नहीं पड़ेगी…’ ईश्वर-पत्नी ने समझाया.

जानती हूं, मगर मेरे पति बहुत स्वाभिमानी हैं. फिर जब हम स्वयं इलाज करा सकते हैं तो किसी का एहसान क्यों लें!’

लगता है तुम्हे सुख से लगाव नहीं है?

मैं सिर्फ अपनी आने वाली पीढ़ियों को निकम्मा और परजीवी होने से बचाना चाहती हूं. आज आप मुझे वरदान देकर सुखी बना दोगे, मगर मेरे बच्चे, उन्हें तो मैं अपने जीवन से ही शिक्षा दे सकती हूं. बच्चों के पिता का कहना है कि मृत्युलोक में मिट्टी ही हमारा कल्याण कर सकती है. और स्वर्ग में जहां का राजा बदचलन हो, जो पराई स्त्री को स्त्री न समझता हो, नग्न अप्सराओं का नांच जिसके लिए प्रतिष्ठा का विषय हो, वहां के बारे में सोचना भी क्या.कुत्ता मन ही मन उस स्त्री को नमन करने लगा.

ओमप्रकाश कश्यप

2 Responses to “स्वाभिमान”

  1. आपने एक बार टिप्पणी के प्रत्युत्तर में विष्णु नागर जी के परिप्रेक्ष्य में अपनी रचनाओं को हल्का बताया था…

    आपका बडप्पन अपनी जगह…

    मेरी चेतना की तो ये घोषणा करने की इच्छा हो रही है, कि नज़रिए और सरोकारों की दृष्टि की सान पर ये रचनाएं बहुत आगे निकल गयी हैं…

  2. समय said

    बेहतरीन।
    समय आपकी सभी रचनाओं से गुजर रहा हैं।

    एक अनोखापन है, यहां।

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